हम दोनों !
ये बेहतर जानते हैं
जमीं ही सफ़र है,
जमीं ही जिंदगी
फिर भी...
हमारे ...
चाहत के आईने में
वो आसमान झलकता है
जो हमारी दस्तरस से बाहर है
तुम तलाशते हो मुझमे जो मैं नहीं
मैं तलाशती हूँ तुममे जो तुम नहीं !
~S-roz~
अधूरे ख्वाब
"सुनी जो मैंने आने की आहट गरीबखाना सजाया हमने "
विस्मृत नहीं हो पाती सारी स्मृतियाँ, "डायरी के फटे पन्नों पर" प्रतीक्षारत अधूरी कृतियाँ जिन्हें ब्लॉग के मध्यम से पूर्ण करने कि एक लघु चेष्टा ....
Monday, August 13, 2012
Sunday, August 12, 2012
"प्यास"
मेरी खिड़की पे
सर को पटकती हुई
चल रही है जो तीखी हवा
घिर के उमड़ी चली आ रही है
पच्छिम से जो काली घटा
घोर अँधेरे में सीने में गूंजी है
जो बूंदों की सदा .....
फिर भी .......
प्यास हल्क़ूम में है
जिस्म में है जाँ में है
जैसे के हम
झुलसते रेगिस्तां में हैं
~s-roz ~
हल्क़ूम=कंठ
सर को पटकती हुई
चल रही है जो तीखी हवा
घिर के उमड़ी चली आ रही है
पच्छिम से जो काली घटा
घोर अँधेरे में सीने में गूंजी है
जो बूंदों की सदा .....
फिर भी .......
प्यास हल्क़ूम में है
जिस्म में है जाँ में है
जैसे के हम
झुलसते रेगिस्तां में हैं
~s-roz ~
हल्क़ूम=कंठ
Thursday, August 9, 2012
श्याम श्याम श्याम श्याम
निःशब्द धरा,निःशब्द व्योम,
निःशब्द अधर पर रोम-रोम
टेर रहा बस तेरा नाम
श्याम श्याम श्याम श्याम !!
निःशब्द अधर पर रोम-रोम
टेर रहा बस तेरा नाम
श्याम श्याम श्याम श्याम !!
जन्माष्टमी की ढेरों बधाइयाँ और शुभकामनाएँ :))
"राम स्पर्श"
तुम्हारे शब्दों के"राम स्पर्श" ने
ह्रदय वन में,उगे बनफूल को
जाने कैसे तो, छुआ था
अब आकर देखो तो
वो रूप से नहीं
गंध से नहीं
वर्ण से नहीं
बल्कि सम्पूर्ण
वानस्पतिक तत्व से
अकेला ही जी-वन से भरा
उप-वन हो गया है
~s-roz~
ह्रदय वन में,उगे बनफूल को
जाने कैसे तो, छुआ था
अब आकर देखो तो
वो रूप से नहीं
गंध से नहीं
वर्ण से नहीं
बल्कि सम्पूर्ण
वानस्पतिक तत्व से
अकेला ही जी-वन से भरा
उप-वन हो गया है
~s-roz~
Wednesday, July 18, 2012
"वह अज्ञात "
ह्रदय बिंदु में
अश्रु सिन्धु में
डूबते ..
उतरते ..
तिरते ...
किनारे की आस
मिलन की प्यास
बुझती स्वांस
दैहिक ह्रास
किन्तु .......!
वह अज्ञात ..वह अज्ञात ..वह अज्ञात !!!
~S-roz~
अश्रु सिन्धु में
डूबते ..
उतरते ..
तिरते ...
किनारे की आस
मिलन की प्यास
बुझती स्वांस
दैहिक ह्रास
किन्तु .......!
वह अज्ञात ..वह अज्ञात ..वह अज्ञात !!!
~S-roz~
Wednesday, July 11, 2012
अकवन-सत्य बीज
आज क्यारी में स्वयं उग आए
अकवन के पौध को देख
सहसा यह विचार उमड़ा कि
अकवन" के बीज को बिजता नहीं कोई
इसके रुई से हर गोले के मध्य एक बीज होता है
मानों उसे ईश्वर ने पंख दिए हों
जहाँ जाकर गिरता है वहीँ उग आता है
अपने अस्तित्व को मिटने नहीं देता
इन्हें खाद पानी की भी आवश्यकता नहीं
बिलकुल उस "सत्य" की भांति
जिसे किसी तर्क की आवश्यकता नहीं
किन्तु कड़वा होता है उसके दूध की भांति
वरना हमने इस धरती पर
झूठ बोने और उगाने में
कोई कसर नहीं छोड़ी है !!
~S-roz~
अकवन=आक/मदार/अर्क /अक्क
Monday, July 9, 2012
"अश'आर "
सुलझी बाते ही आजकल बहुत उलझी रहती है "रोज़"
इसलिए अब कोई इन बातों में जल्दी उलझता नहीं
इसलिए अब कोई इन बातों में जल्दी उलझता नहीं
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ये फरेब आइनों का शहर है "रोज़" !
एक चेहरे में कई चेहरे नजर आते हैं
एक चेहरे में कई चेहरे नजर आते हैं
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मेरी नजर तो है पर नजर की परख कहाँ
मैं जानती हूँ, हर जगह है तू, मगर कहाँ ?
मैं जानती हूँ, हर जगह है तू, मगर कहाँ ?
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फिजां की नब्ज़ नब्ज़ भांप लेते हैं बड़े एहतियात से
मगर हजरत से दिल की धड़कन पहचानी नहीं जाती
मगर हजरत से दिल की धड़कन पहचानी नहीं जाती
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उनके जुल्म की लाइंतहांइयां अज़ाब हैं
और मेरे सब्र का जौहर बे-हिसाब है !
(लाइंतहांइयां=असीमिततायें )
और मेरे सब्र का जौहर बे-हिसाब है !
(लाइंतहांइयां=असीमिततायें )
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हर दफे सुनाते हो बीते कल की दास्ताँ हमें
है जो रब्त हमसे तो आज की बात सुना मुझे
है जो रब्त हमसे तो आज की बात सुना मुझे
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चोट खा कर जो अभी गिरे हैं, हमें उठाये ना कोई
गिर कर जो खुद उठता है फिर यूँ गिरता नहीं कभी
गिर कर जो खुद उठता है फिर यूँ गिरता नहीं कभी
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इससे पहले के रुख बदले ये हवा और वो नजर"रोज़"
बेहतर है, उससे पहले अपने घर लौट जाना महफूज़
बेहतर है, उससे पहले अपने घर लौट जाना महफूज़
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जिंदगी तो इन्ही ख्वाबों में वाबस्ता है
वरना "रोज़" यहाँ जीना कौन चाहेता है
~S-roz~
वरना "रोज़" यहाँ जीना कौन चाहेता है
~S-roz~
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