अधूरे ख्वाब


"सुनी जो मैंने आने की आहट गरीबखाना सजाया हमने "


डायरी के फाड़ दिए गए पन्नो में भी सांस ले रही होती है अधबनी कृतियाँ, फड़फडाते है कई शब्द और उपमाएं

विस्मृत नहीं हो पाती सारी स्मृतियाँ, "डायरी के फटे पन्नों पर" प्रतीक्षारत अधूरी कृतियाँ जिन्हें ब्लॉग के मध्यम से पूर्ण करने कि एक लघु चेष्टा ....

Wednesday, April 22, 2020

लुफ्त-उन-निसा

लुफ्त-उन-निसा 

(जो  ताजिंदगी आलीशान  हाथी सवार (सिराजुद्दोला )की सज्जा संगनी रह  चुकी हो वो गधे की पीठ पर सवार होने वाले(मिरजाफ़र )की अंकसायनी कतई नहीं हो सकती)

 

गद्दार मिरजाफ़र के निकाह प्रस्ताव पर ऐसा संदेश भेजने वाली जाँबाज महिला के बारे में शायद ही बहुत लोग जानते हों क्योंकि इतिहास ने ऐसी कई महिलाओं को अपने अंक में शरण नहीं दी है तो आइये जाने कौन थी लुफ्त-उन-निसा  ?

१७४० में अलीवर्दी खान बंगाल के नवाब बने। जिन्होने १७५६ तक बंगाल की कमान संभाली । उनकी दो बेटियाँ हुईं अमीना बेगम एवं घसीटी बेगम ।सिराजुद्दोला अमीना बेगम के पुत्र थे ।सन १७५६ में अलीवर्दी खान की मृत्यु के बाद सिराजुद्दोला बंगाल बिहार और उड़ीसा के अंतिम स्वाधीन नवाब नवाब बने।

 लुफ्त-उन-निसा  सिराजुद्दोला की दूसरी  बेगम थीं । जिनके बारे में कहा जाता है कि वो गरीब हिन्दू परिवार की बेटी थी। जिसका जन्म के सिराजुद्दोला नाना अलीवर्दी खान के जानना महल में हुआ था। जो बाद में सिराजुद्दोला की माँ अमीना बेगम की परिचारिका बनी। जिसे राजकंवर के नाम से पुकारा जाता था ।मुर्शिदाबाद के हजारदुआरी राजप्रासाद में वो अमीना बेगम की सेवा किया करती थी । लुफ्त-उन- निसा  बहुत ही रूपवान गुणी व मृदुभाषी थी। उसने अपने नम्र व्यवहार से  अमीना बेगम का दिल जीत लिया था ।अमीना बेगम भी उनसे अगाध स्नेह करती थी ।उस वक़्त सिराजुद्दोला का विवाह अभिजात्य वर्ग के इराज खान की पुत्री उम्दत-उन-निसा से १७४६ में १३ वर्ष की आयु में हो चुका था ।किन्तु वह अपनी शादी शुदा ज़िंदगी से संतुष्ट नहीं थे कारण उनकी कोई संतान नहीं थी ।उसी वक़्त अमीना बेगम ने राजकंवर को सिराजुदौला की सेवा में लगा दिया । सिराजुद्दोला राजकंवर के सौंदर्य व गुण पर मोहित हो चुके थे ।और राजकंवर भी सिराज के व्यक्तित्व व पराक्रम से प्रभावित थी ।  उससे आकृष्ट होकर सिराज ने  अपनी माँ के समक्ष राजकंवर से विवाह का प्रस्ताव रक्खा जिसे अमीना बेगम ने सहर्ष स्वीकार कर लिया ।१७५० में निकाह के समय राजकंवर को इस्लाम की दीक्षा देकर लुफ्त-उन-निसा नाम दिया गया जिसे सिराज प्यार से लुत्फ़ा बुलाया करते । लुफ्त-उन-निसा  से सिराज को एक पुत्री का जन्म हुआ ।जिसका नाम रक्खा गया ज़ोहरा बेगम उर्फ कुदिसा बेगम । १७४८ में सिराज के पिता जोइनूद्दीन अहमद खान अफगानी विद्रोहियों द्वारा मारे गए उसके पश्चात सिराज के नाना अलीवर्दी खान  ने सिराजुद्दोला को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया । सिराज के नवाब बनते ही बंगाल का दरबार पारिवारिक षड्यंत्रों का अखाड़ा बन गया।  सिराजुद्दोला मात्र १५ महीने सत्तारूढ़ रहे उनके अपनों ने ही उनका साथ नहीं दिया रिश्तेदारों द्वारा ही सिराज को गद्दी से उतारने के लिए कई षड्यन्त्र रचे गए  ऐसे में एकमात्र सिराज की प्रियतमा पत्नी  लुफ्त-उन-निसा उनके साथ खड़ी रहीं। सिराज के साथ सबसे बड़ा विश्वासघात हुआ प्लासी के युद्ध में सन् 1757 में प्लासी के मैदान में बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला और इस्ट ईंडिया कंपनी के कप्तान राबर्ट क्लाईव के बीच हुई सिराज की विशाल १८०० सेना के समक्ष लॉर्ड क्लाइव की मात्र ६००० सेना थी ।क्लाइव को हराना बेहद आसान था किन्तु सिराज के सेनापति मिरजाफ़र लॉर्ड क्लाइव के साथ मिलकर भीषण गद्दारी की और सिराज की सेना युद्ध हार गयी ।हार के पश्चात सिराज ने बहुतों से मदत मांगी मगर अपनों में से किसी ने भी उनकी मदद नहीं की यहाँ तक की सिराज के ससुर इराज खान ने भी मदत नहीं की ।साथ थी तो बस लुफ्त-उन-निसा व उनकी तीन साल  की बेटी तीनों वेश बदलकर पटना में छिपने की कोशिश की मगर दुर्भाग्य  से सिराज पकड़े गए उन्हे बंदी बनाकर मिरजाफ़र के आवास पर लाया गया जो मुर्शिदाबाद में है जिसे अब "नमक हराम की ड्योढ़ी" कहा जाता है । २ जुलाई १७५७ को मिजाफ़र के पुत्र मिरन के कहने पर अलिबेग ने सरे आम गोली मारकर  सिराज की हत्या कर दी और उनके शव को हाथी पर लादकर पूरे नगर में घुमाया गया ताकि लोगों में ईस्ट इंडिया कंपनी के नाम का डर बैठ  जाये । मिरजाफ़र के भय से सिराज के शव को कोई हाथ भी नहीं लगा रहा था बाद में मिर्ज़ा ज़एन ने अपनी जान कि परवाह न करते हुये सिराज के शव को भागीरथी नदी  के पास खुशबाग में जंहा उनके नाना  अली वर्दी खान को दफनाया गया था उन्ही के पास दफना दिया ।प्लासी के युद्ध को भारत के लिए बहुत दुर्भाग्यपूर्ण माना जाता है। इस युद्ध से ही भारत की दासता की कहानी शुरू होती है ।

सिराज की मृत्यु के बाद लॉर्ड कलाइव ने मिरजाफ़र को बंगाल का नवाब बना दिया ।नवाब बनने के बाद उसने सिराज के जानना महल में संदेश भिजवाया कि सभी औरतें उसकी हरम में रह सकती हैं ।मिरजाफ़र और उसका पुत्र मिरन दोनों लुफ्त-उन-निसा के सौंदर्य पर मोहित थे व उससे निकाह करना चाहते थे ।मिरजाफ़र ने लुफ्त-उन-निसा को कई बार निकाह के संदेश भेजे हर बार लुफ़्तूनिसा ने मना कर दिया आखिर तंग आकार उत्तरसने एक पत्र के मार्फत संदेश भिजवाया कि" जो  ताजिंदगी आलीशान  हाथी सवार (सिराजुद्दोला )की सज्जा संगनी रह  चुकी हो वो गधे की पीठ पर सवार होने वाले(मिरजाफ़र )की अंकसायनी कतई नहीं हो सकती)" उसके बाद मिरजाफ़र ने लुफ्त-उन-निसा उसकी बेटी एवं जानना महल की सभी औरतों को बंदी बनाकर ढाका के  जिंजीरा महल जो कि जीर्ण शीर्ण हो चुका था उसमे 7 साल तक कड़े पहरे में  नज़रबंद रखा ।उसके बाद उन्हे मुर्शिदाबाद लाया गया जहां आने के बाद लुफ्त-उन-निसा सिराज की विधवा ही बनकर रही व खुशबाग में अपने नाना  ससुर व सिराज की समाधि की  देखभाल करती रही जिसके लिये ईस्ट इंडिया कंपनी उन्हे 301 रुपये सालाना भत्ता देती व उनके खर्चे के लिए 1000 रुयए सालाना व्यक्तिगत भत्ता  मिलता । व सिराज की पहली पत्नी उम्दत-उन-निसा को 500 रुपये व्यक्तिगत भत्ता मिलता था बाद में उन्होने दूसरी शादी कर ली किन्तु लुत्फ-उन-निसा ताजिंदगी सिराज के प्रति समर्पित रहीं ।वो प्रतिदिन  दिन सिराज की  समाधि आतीं व सारा दिन वहीं रहती धूप बत्ती  करने के बाद ही जातीं

 आर्थिक दृष्टि से कमजोर होते हुये भी उसने अपनी बेटी की शादी बड़े साधारण तरीके से की उनकी  चार लड़कियां हुई कुछ वर्ष बाद लुफ्त-उन-निसा की बेटी व दामाद भी चल बसे अब चारों बच्चियों की पालन पोषण व ब्याह की ज़िम्मेदारी भी लुफ़्त-उन-निसा ने निभाई ।लुफ्त-उन-निसा यदि चाहती तो मिरजाफ़र के महल में विलासी जीवन जी सकती थीं मगर वो उस रास्ते गईं नहीं आत्मसमर्पण नहीं किया । सिराज के साथ  दुःख में सुख में आपदा में विदा में सकल दुःसमय में इस गरिमामय नारी से सिराज को सांत्वना व संबल दिया ! सिराज के जीवन काल में जैसी वो संगिनी रही मृत्यु पर्यंत भी वो सिराज की समाधि के पास अपने शेष दिन काटे व उनकी समाधि पर ही मरी पायी  गईं ।1766  से लेकर 1786 तक दीर्घ 21वर्ष तक वो संघर्षमय जीवन व्यतीत करती रही मात्र एक अपनी कन्या के अवलंबन पर एवं सिराज की स्मृति में ।

तो ये थी लुफ्त-उन-निसा की कहानी जो मात्र कहानी नहीं यथार्त है ! नमन है ऐसी विभूति को !!सरोज


3 comments:

  1. इतिहास के कुछ ऐसे चरित्र हुए जिन्हें कोई नहीं जानता । खासतौर पर यदि नशवह इतिहास का विद्यार्थी न रहा हो । सरोज बहुत आभार ऐसे प्रसंगों और चरित्रों को प्रस्तुत करने के लिए ।

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  2. जानकारी भरा आलेख -----

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  3. इतिहास की महत्वपूर्ण जानकारी.

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