अधूरे ख्वाब


"सुनी जो मैंने आने की आहट गरीबखाना सजाया हमने "


डायरी के फाड़ दिए गए पन्नो में भी सांस ले रही होती है अधबनी कृतियाँ, फड़फडाते है कई शब्द और उपमाएं

विस्मृत नहीं हो पाती सारी स्मृतियाँ, "डायरी के फटे पन्नों पर" प्रतीक्षारत अधूरी कृतियाँ जिन्हें ब्लॉग के मध्यम से पूर्ण करने कि एक लघु चेष्टा ....

Tuesday, July 16, 2013

"दिवस के अवसान में "

दिवस के अवसान में
घिरती घटायें घन सी
छेड़ती है तार तन की
विरह का कोई गीत गाऊँ
साँझ का दीया जलाऊँ
बुझे मन के दलान में .....!

काल के मध्याह्न में
तृष्णायें हर क्षण सताती
कामनाएं कुनमुनाती
बांचता है ज्ञान अपना
योग का मन-मनीषी
मोह के उद्यान में........ !

ह्रदय के सिवान में
प्रेम का जो धान रोपा
नेह के न बरसे बादल
नियति ने परोसे हलाहल
भाग्य बैरी सोया रहा
दुर्भाग्य के मचान में ......!

निराशा के मसान में !
चिंता चिताओं सी जल रही
जिजीविषा हाथ मल रही
अँधियारा जो छंटता नहीं
मैं बाँट जोहूँ सूर्य का
आशा के नव-बिहान में !!
~s-roz~
सिवान =खेत

4 comments:

  1. अद्वितीय अभिव्यक्ति दीदी ,, बहुत सुन्दर...!!

    ReplyDelete
  2. सादर आभार श्री प्रसन्न वदन चतुर्वेदी जी !!

    ReplyDelete