अधूरे ख्वाब


"सुनी जो मैंने आने की आहट गरीबखाना सजाया हमने "


डायरी के फाड़ दिए गए पन्नो में भी सांस ले रही होती है अधबनी कृतियाँ, फड़फडाते है कई शब्द और उपमाएं

विस्मृत नहीं हो पाती सारी स्मृतियाँ, "डायरी के फटे पन्नों पर" प्रतीक्षारत अधूरी कृतियाँ जिन्हें ब्लॉग के मध्यम से पूर्ण करने कि एक लघु चेष्टा ....

Saturday, November 16, 2013

"ग़ज़ल "शोर करते थे परिंदे


बग़ैर मोड़ हमसफ़र, मुड़ गए तो क्या हुआ 
ग़ैर क़ाफ़िलों से तुम, जुड़ गए तो क्या हुआ

कोई आहट भी नहीं, कोई दस्तक़ भी नहीं 
भीड़ में अना के बिछुड़ गए तो क्या हुआ 

कट गया गली का वो आखिरी दरख़्त भी 
शोर करते थे परिंदे, उड़ गए तो क्या हुआ 

बीती शब्, तेरे शक-ओ-शुबा की आंधी में
रिश्तों के सफ़हे, मुड़-तुड़ गए तो क्या हुआ 

धुंध ने चुरा लियें हैं रंग-ओ-चमक धूप के 
ठंड से दिन ये, सिकुड़ गए तो क्या हुआ

भरा रहे दरिया प्रेम का, 'रोज़' इसके वास्ते 
रेत साहिल के सारे निचुड़ गए तो क्या हुआ
!
~s-roz~

Tuesday, November 12, 2013

"तुम तो आकाश हो"


नेह के नीले एकांत में 
क्षितिज की सुनहरी पगडंडी पर 
चलते हुए.....
तुम्हारे होने या ना होने को 
सूर्यास्त से सूर्योदय के बीच 
कभी विभक्त नहीं कर पायी मैं !

जाने कब से 
धरती पर चलती आ रही मैं 
इस ज्ञान से परे, कि
तुम अपनी छ्त्रछाया में 
संरक्षित करते आये हो मुझे !

अपनी थाली में परोसते रहे 
मन भर अपनापन 
ना होते हुए भी तुम्हारे होने का 
आभास् होता रहा मुझे !

ऋतुएँ संबंधों पर भी 
अपना असर दिखाती है शायद 
चटकती बिजली ने 
तुम्हारे सिवन को उधेड़ते हुए 
जो दरार डाली है 
तुम्हारी श्वेत दृष्टि अब श्यामल हो उठी है !

या तुम बहुत पास हो 
या कि बहुत दूर
पर वहां नहीं हो जहाँ मैं हूँ 
संबंधों पर ठण्ड की आमद से 
सूरज भी अधिक देर तक नहीं टिकता !

ऐसे अँधेरे से घबराकर मैं 
स्मृतियों की राख में दबी 
चिंगारियों को उँगलियों से 
अलग कर रही हूँ 
किन्तु उससे रौशनी नहीं होती 
बल्कि उंगलियाँ जलतीं है !

तुम्हे दस्तक देना चाहती हूँ 
पर तुम तो आकाश हो ना 
कोई पट-द्वार नहीं तुम्हारा 
बोलो....तो कहाँ दस्तक दूँ ?
जो तुम सुन पाओ !!! 

~s-roz~

Thursday, October 24, 2013

"इक चोट की मुंतज़िर "


रास्ते के गर्द आलूद पत्थर पर
जो उसकी नज़रें इनायत हुईं
उसे गढ़ने को वो मचलने लगा
शिल्पी उसे तराशता गया
बुत निखरती गई, संवरती गई

राहगीर रुक रुक कर
उसके रूप को निहारा करते ...

कभी कोई बोल उठता
"जान पड़ता है इसमें जान ही डाल दोगे"
इन सब से बे खबर
उसकी छेनी हथौड़ी चलती रही

अचानक जोर की चोट
और उसकी उँगलियों में उभर आये
लहू के चंद क़तरे........
शिल्पी नफरत से भर उठा
उसे वहीँ छोड़ आगे बढ़ गया
कोई और मूरत गढ़ने

अब ना वो बुत ही रही ना ही पत्थर
नीम ज़िन्दा सी ....
हर आने जाने वालो की
हिक़ारत भरी उन नज़रों से कहती
'इक चोट की मुंतज़िर हूँ मैं '

बावली, नहीं जानती
आज का राम
वो वक़्त है ..............
जो जिस राह गुज़र गया
फिर लौट के नहीं आया

इक पल का वक़्त जो उसके पास होता
तो उस वक़्त देख पाता
जो लहू के क़तरे उसके हाथों पर उभरे थे
वो उसके नहीं .....
बुत के सीने से निकले थे

आह !! चोट खाकर भी चोट की मुंतज़िर है अहिल्या !!
~s-roz~

Monday, October 21, 2013

"ग़ज़ल"

ख्वाब जो हक़ीक़त हो गया है
पर कुछ तो है जो खो गया है

भिगो के अश्क़ों से मेरा दामन
दाग अपने सारे वो धो गया है

देख के मेरे दिल की ज़रखेज़ी
फ़सल दर्द की वो बो गया है

आया था मेरे ख़्वाब सजाने 

पलकों पे मोती पिरो गया है

दिल के गाँव में आबाद था जो
शहर जाकर वो शहर हो गया है

हर आहट पे जो जाग़ उठता था
इंतज़ार roz का अब सो गया है

~s-roz~
ज़रखेजी=उपजाऊपन

Saturday, October 19, 2013

"विरसे में निकलेगा प्रेम"


बर्तन,सिक्के,मुहरें,
मिट्टी के ढेर में पोशीदा चक्की-चूल्हे
बेनाम ख़ुदाओं के बुत टूटे-फूटे
 कुंद औज़ार , ज़ेवर मटमैले
क्या बस,इतना ही विरसा है हमारा ?
सोचती हूँ .....
जाने से पहले
मिटटी में गाड़ जाऊँ ...

सहेजा......संजोया
"प्रेम"......................!
~s-roz~

Thursday, October 10, 2013

"ग़ज़ल"

घाट की चढ़ती सीढ़ी तेरी, तुझे आसमां दिखलाए है
उतरती सीढ़ी मेरी जो पानी में आसमां झलकाए है

यहीं हमारा ठौर-ठिकाना, अब यही हमारी दुनिया है
पिंजरे की चिड़िया  दूजे को हरपल यही समझाए है

कूड़े के कचरे में लिपटी, अधमरी, नंगी, भूखी बच्ची
रो रो कर जाने वो किसको अपनी फरियाद सुनाए है

रखना बंद वरना बिगड़ जायेंगी घर की सभी तहजीबें ...

खुली खिड़कियों से बंद दरवाज़ा अक्सर ये बतलाये है

जो तू मेरी ना बनी, तो किसी और की भी ना बनेगी
आज का मजनू roz तेज़ाब लिए लैला को धमकाए है !!
~s-roz~

Tuesday, October 8, 2013

"रिश्ते व प्रेम "

आजकल घर
वातानुकूलित होते हैं
बदलते मौसम का असर
घर पर ............
नहीं होता !
ऐसे एकरस माहौल से
ऊब चुके रिश्ते .....
घर के बंद सांकलों में
अटक कर रह जाते हैं
और उनमे घुट घुट कर ...

जीता " प्रेम "
दरवाजे की महीन झिर्रियों से
बह निकलता है !!!
~s-roz~