अधूरे ख्वाब


"सुनी जो मैंने आने की आहट गरीबखाना सजाया हमने "


डायरी के फाड़ दिए गए पन्नो में भी सांस ले रही होती है अधबनी कृतियाँ, फड़फडाते है कई शब्द और उपमाएं

विस्मृत नहीं हो पाती सारी स्मृतियाँ, "डायरी के फटे पन्नों पर" प्रतीक्षारत अधूरी कृतियाँ जिन्हें ब्लॉग के मध्यम से पूर्ण करने कि एक लघु चेष्टा ....

Saturday, October 4, 2014

ग़ज़ल


अपनी बेरुख़ी से खुद ही खफा हूँ मैं न मिल मुझसे ज़माने की हवा हूँ मैं

तुझसे न मिलने का क्यूँ हो मलालतस्सव्वुर में मिलती कई दफ़ा हूँ मैं

खरीद न पाओगे बाज़ार से अब तुमक़ीमत नहीं जिसकी वो वफ़ा हूँ मैं

गर करते हो कारोबार रिश्तों में भीक्या हासिल न नुकसान न नफ़ा हूँ मैं राह-ए-कुफ़्र से न डरा मुझको 'रोज़'ज़िन्दगी की ज़ानिब बेपरवा  हूँ मैं s-roz

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