अधूरे ख्वाब


"सुनी जो मैंने आने की आहट गरीबखाना सजाया हमने "


डायरी के फाड़ दिए गए पन्नो में भी सांस ले रही होती है अधबनी कृतियाँ, फड़फडाते है कई शब्द और उपमाएं

विस्मृत नहीं हो पाती सारी स्मृतियाँ, "डायरी के फटे पन्नों पर" प्रतीक्षारत अधूरी कृतियाँ जिन्हें ब्लॉग के मध्यम से पूर्ण करने कि एक लघु चेष्टा ....

Monday, December 9, 2013

" ग़ज़ल" (आज के सियासी हालात पर)

"आप" का अनुबंध कितने दिन चले 
देखते हैं, ये प्रबंध कितने दिन चले 

ना दिखेगा कासा किसी के हाथ में 
देखते हैं,ये सौगंध कितने दिन चले 

अबके सावन फिर, भर उठेगी नदी 
देखतें हैं,ये तटबंध कितने दिन चले 


जो डोर थी उसमे पड़ी गांठे ही गांठे 
देखते हैं,ये सम्बन्ध कितने दिन चले 

इसे तोड़ उसे जोड़ की है ये राजनीति 
देखते हैं, ये गठबन्ध कितने दिन चले 

~s-roz~

Saturday, December 7, 2013

"ग़ज़ल"

जितना कम सामां
सफ़र उतना आसां

मुझे अब याद आई 
बुजुर्गों की वो ज़बां

निकले थे सफ़र में 
लेकर ढेरों अरमां 

दोनों हथेलियों में 

भरकर दौलते जहां 

रस्ते में मज़लूम थे 
बच्चे बूढ़े औ जवां

खोली न मुट्ठी कभी 
सफ़र के दरमियां

गैरत से दामनकशां 
हुए ना हम पशेमां

था आगे सफ़र में 
बियाबां ही बियाबां

दूर तलक़ जंगल में 
ना मकीं थे न मकां

आगे देखा ज़बल जब 
तब हुए हम परीशां

बिना सहारे चढ़ना 
क़तई न था आसां

चलना ज़िन्दगी थी 
रुकना ख़तरा-ए-जां 

खोल दी हथेलियां 
दौलत हुआ जियां

देने को सहारा मुझे 
फैली थी शाखें वहां 

खुदा भी ले रहा था 
खुदगरज़ी की इम्तहां

ख़ाली हाथ आये थे 
ख़ाली रुख़सते-जहां

~s-roz~
मजलूम =मजबूर /पीड़ित
दामनकशां = दामन बचाते हुए 
पशेमां=लज्जित 
ज़बल=पर्वत 
मकीं =मकान में रहने वाले 
जियां=व्यर्थ 
रुख़सते-जहां=जहां से विदा होना

Tuesday, December 3, 2013

"ग़ज़ल"

सुर, सरगम आवाज़-ओ-साज़ मांगती है 
जिंदगी राग-ए-दर्द का रियाज़ मांगती है

कब, कहाँ, कैसे, कितना, क्या-क्या किया 
उम्र की बही हर साँस का ब्याज मांगती है

वसीयत के साथ उम्र भी बंट गयी उसकी 
वो मगर,बच्चों की उम्र-ए-दराज़ मांगती है

पर क़तरे और फ़र्श पर जमे है पांव मगर 

हिम्मत अर्श के रुख को परवाज़ मांगती है

किस्मत में आसाइश-ए-मंजिल हो के न हो 
'रोज़' हर इक अंजाम का आगाज़ मांगती है

~s-roz~
आसाइशे-अंजाम= happy ending

Wednesday, November 27, 2013

"रिपोर्टर"

उसने देखा 
खून से लथपथ 
सड़क के बीचो-बीच 
तडफड़ाता आदमी 
और कन्नी काटते लोग 
वो कैमरा घुमाता रहा 
और बनायी उसने 
मौक़ा-ए-वारदात की 
सच्ची रिपोर्ट 
लोग देख शर्मशार थे 

उसने देखा आधी रात 
पब से निकलती 
अकेली लड़की 
और उसके इस अपराध पर 
बीच सड़क 
उसके कपड़े नोचते लोग 
और वो .....
उसके अधनंगे जिस्म पर 
कैमरा घुमाता रहा 
लाइव दिखता रहा 
लोगों को सच्ची रिपोर्ट 
जनता सकते में थी 

उसने देखा 
अनशन में 
अपनी मांग पूर्ति के वास्ते 
एक युवक को खुद पर 
मिट्टी का तेल छिड़कते 
फिर आग लगाते 
भीड़ देखती रही 
वो तस्वीर लेता रहा 
इस रिपोर्ट पर 
लोगों में ...
आग भड़क चुकी थी 

उसने देखे 
सुनामी, भूकंप 
दंगे-फसाद 
अँधेरगर्दी, अनाचार
और तैयार की 
जाने कितनी ही ख़बरें 
आला दर्जे का वो रिपोर्टर 
अनगिन पुरस्कारों से नवाज़ा गया 
उसने रिपोर्टर होने का फ़र्ज़ निभाया 
बाक़ीयों को ..............
आदमी होने का फ़र्ज़ निभाना था !!
~s-roz~

Tuesday, November 26, 2013

"इज्ज़त का पैमाना "


कल हवस के भूखों ने
जिस्म छलनी किया 
कपड़े तार-तार किये 
आज के अख़बार में 
ख़बर ये थी 
"इक मासूम की इज्ज़त-ओ-आबरू तार-तार हुई" 
लानत है ख़बर वालो पर 
जिन्हें ये इल्म ही नहीं कि 

इज्ज़त वज़ूद की होती है 
जिस्म की नहीं ...!!!!


हमारी ज़ात की औक़ात पर इस तरह की सोच बदनुमा धब्बा है 
जिसे मिटाना हरहाल जरुरी है .......! सबसे बड़ा सवाल ये है "कि हमारे समाज में इज्ज़त के पैमाने अलग-अलग क्यूँ ??? किसी मर्द के जिस्मानी अंगों पर चोट हो या शोषण हो तो उसे घायल या पीड़ित कहेंगे ..फिर किसी औरत के साथ यही हो तो उसकी इज्ज़त कैसे चली जाती है ??? ये कोई समझाए मुझे ..! इसके लिए सबसे बड़े दोषी मीडिया वाले तो हैं ही जो चीख चीख कर यही डायलाग दुहराते रहते हैं !! साथ हमारी संकीर्ण सोच भी दोषी है ....
जिस दिन यह सोच हमारे ज़ेहन से चली जायेगी उस दिन पीड़िता समाज से मुहं नहीं छिपाएगी और ढके छिपे अपराध भी खुलकर बाहर आ सकेंगे ....! 
वगरना तो ................


सी कर होठों को
कानों पे बिठा के पहरे 
खुद को.....
किसी आहनी ताबूत में रख दें
कि हमें ..............
इज्ज़त से ज़िंदगी करने की 
क़ीमत भी चुकानी है यहाँ............!

~s-roz~

Thursday, November 21, 2013

"बिवाइयां "

बचपन के जाड़ों में 
मुझे याद आता है 
जब माँ की एड़ियां 
फटने लगती ....
उनपर वो लगातीं थी 
मधु के छत्ते का मोम
और हमारी एड़ियों को 
वो जुराबों में महफूज़ कर देती !

अब जो देखती हूँ 
कंक्रीट से रूखी होती सतह 
और अज़ल से रौंदी गयी 
ज़मीं की फट रही बिवाइयों को 
तो जी करता है 
दरिया के तह से 
खुरच लाऊं .....
उर्वर माटी का मोम 
और भर दूँ उन ज़ख्मो पर 
ताकि उसके रोमकूपों से 
सांस ले सके 
नन्हे-नन्हे बिरवे !

माना के मेरा यह ख़याल 
चींटी की चीनी के दाने भर सा है 
पर यह इल्म भी है 
कि चीटियाँ...... 
अकेली नहीं चलती 
क़तारों में वो चाहे तो 
चीनी का ढेर लगा सकती है 
फिर हम अपनी माँ की 
फटी बिवाइयों को 
क्यूँ नहीं भर सकते ?

डरती हूँ उस दिन के लिए 
जब खेतों की जगह 
रह जाएगा शेष
सिर्फ रेत ही रेत 
और "पृथ्वी" ....
घायल ऊंटनी सी 
दौड़ेगी मरुथल-मरुथल 
और हम उसका पेट काट 
पी रहे होंगे जल !!!!

~s-roz~

Monday, November 18, 2013

पता नइखे /भोजपुरी गज़ल



कहीं भगवान के पता नइखे 
कहीं इंसान के पता नइखे 

सगरो अन्हियार बढल बा 
सुरुज-बान के पता नइखे 

पोथी पढ़ पंडित बन गईले
जिए-भर ग्यान के पता नइखे 


जे उगवलस खेत में सोना 
ओकरे धन-धान के पता नइखे 

कबले होई आस के अंजोर 
ऊ बिहान के पता नइखे 

इहाँ मुर्दा बनल सब अदमी 
अब समसान के पता नइखे 

बदलत बा इंसान के फितरत 
कहीं ईमान के पता नइखे 

जेहमे कब्बो करज न उगे 
ऊ सिवान के पता नइखे 

~s-roz~

अन्हियार=अँधेरा 
ग्यान=ज्ञान
उगवलस=उगाया 
बिहान=दिन 
समसान =श्मशान 
सिवान=खेत 




Saturday, November 16, 2013

"ग़ज़ल "शोर करते थे परिंदे


बग़ैर मोड़ हमसफ़र, मुड़ गए तो क्या हुआ 
ग़ैर क़ाफ़िलों से तुम, जुड़ गए तो क्या हुआ

कोई आहट भी नहीं, कोई दस्तक़ भी नहीं 
भीड़ में अना के बिछुड़ गए तो क्या हुआ 

कट गया गली का वो आखिरी दरख़्त भी 
शोर करते थे परिंदे, उड़ गए तो क्या हुआ 

बीती शब्, तेरे शक-ओ-शुबा की आंधी में
रिश्तों के सफ़हे, मुड़-तुड़ गए तो क्या हुआ 

धुंध ने चुरा लियें हैं रंग-ओ-चमक धूप के 
ठंड से दिन ये, सिकुड़ गए तो क्या हुआ

भरा रहे दरिया प्रेम का, 'रोज़' इसके वास्ते 
रेत साहिल के सारे निचुड़ गए तो क्या हुआ
!
~s-roz~

Tuesday, November 12, 2013

"तुम तो आकाश हो"


नेह के नीले एकांत में 
क्षितिज की सुनहरी पगडंडी पर 
चलते हुए.....
तुम्हारे होने या ना होने को 
सूर्यास्त से सूर्योदय के बीच 
कभी विभक्त नहीं कर पायी मैं !

जाने कब से 
धरती पर चलती आ रही मैं 
इस ज्ञान से परे, कि
तुम अपनी छ्त्रछाया में 
संरक्षित करते आये हो मुझे !

अपनी थाली में परोसते रहे 
मन भर अपनापन 
ना होते हुए भी तुम्हारे होने का 
आभास् होता रहा मुझे !

ऋतुएँ संबंधों पर भी 
अपना असर दिखाती है शायद 
चटकती बिजली ने 
तुम्हारे सिवन को उधेड़ते हुए 
जो दरार डाली है 
तुम्हारी श्वेत दृष्टि अब श्यामल हो उठी है !

या तुम बहुत पास हो 
या कि बहुत दूर
पर वहां नहीं हो जहाँ मैं हूँ 
संबंधों पर ठण्ड की आमद से 
सूरज भी अधिक देर तक नहीं टिकता !

ऐसे अँधेरे से घबराकर मैं 
स्मृतियों की राख में दबी 
चिंगारियों को उँगलियों से 
अलग कर रही हूँ 
किन्तु उससे रौशनी नहीं होती 
बल्कि उंगलियाँ जलतीं है !

तुम्हे दस्तक देना चाहती हूँ 
पर तुम तो आकाश हो ना 
कोई पट-द्वार नहीं तुम्हारा 
बोलो....तो कहाँ दस्तक दूँ ?
जो तुम सुन पाओ !!! 

~s-roz~

Thursday, October 24, 2013

"इक चोट की मुंतज़िर "


रास्ते के गर्द आलूद पत्थर पर
जो उसकी नज़रें इनायत हुईं
उसे गढ़ने को वो मचलने लगा
शिल्पी उसे तराशता गया
बुत निखरती गई, संवरती गई

राहगीर रुक रुक कर
उसके रूप को निहारा करते ...

कभी कोई बोल उठता
"जान पड़ता है इसमें जान ही डाल दोगे"
इन सब से बे खबर
उसकी छेनी हथौड़ी चलती रही

अचानक जोर की चोट
और उसकी उँगलियों में उभर आये
लहू के चंद क़तरे........
शिल्पी नफरत से भर उठा
उसे वहीँ छोड़ आगे बढ़ गया
कोई और मूरत गढ़ने

अब ना वो बुत ही रही ना ही पत्थर
नीम ज़िन्दा सी ....
हर आने जाने वालो की
हिक़ारत भरी उन नज़रों से कहती
'इक चोट की मुंतज़िर हूँ मैं '

बावली, नहीं जानती
आज का राम
वो वक़्त है ..............
जो जिस राह गुज़र गया
फिर लौट के नहीं आया

इक पल का वक़्त जो उसके पास होता
तो उस वक़्त देख पाता
जो लहू के क़तरे उसके हाथों पर उभरे थे
वो उसके नहीं .....
बुत के सीने से निकले थे

आह !! चोट खाकर भी चोट की मुंतज़िर है अहिल्या !!
~s-roz~

Monday, October 21, 2013

"ग़ज़ल"

ख्वाब जो हक़ीक़त हो गया है
पर कुछ तो है जो खो गया है

भिगो के अश्क़ों से मेरा दामन
दाग अपने सारे वो धो गया है

देख के मेरे दिल की ज़रखेज़ी
फ़सल दर्द की वो बो गया है

आया था मेरे ख़्वाब सजाने 

पलकों पे मोती पिरो गया है

दिल के गाँव में आबाद था जो
शहर जाकर वो शहर हो गया है

हर आहट पे जो जाग़ उठता था
इंतज़ार roz का अब सो गया है

~s-roz~
ज़रखेजी=उपजाऊपन

Saturday, October 19, 2013

"विरसे में निकलेगा प्रेम"


बर्तन,सिक्के,मुहरें,
मिट्टी के ढेर में पोशीदा चक्की-चूल्हे
बेनाम ख़ुदाओं के बुत टूटे-फूटे
 कुंद औज़ार , ज़ेवर मटमैले
क्या बस,इतना ही विरसा है हमारा ?
सोचती हूँ .....
जाने से पहले
मिटटी में गाड़ जाऊँ ...

सहेजा......संजोया
"प्रेम"......................!
~s-roz~

Thursday, October 10, 2013

"ग़ज़ल"

घाट की चढ़ती सीढ़ी तेरी, तुझे आसमां दिखलाए है
उतरती सीढ़ी मेरी जो पानी में आसमां झलकाए है

यहीं हमारा ठौर-ठिकाना, अब यही हमारी दुनिया है
पिंजरे की चिड़िया  दूजे को हरपल यही समझाए है

कूड़े के कचरे में लिपटी, अधमरी, नंगी, भूखी बच्ची
रो रो कर जाने वो किसको अपनी फरियाद सुनाए है

रखना बंद वरना बिगड़ जायेंगी घर की सभी तहजीबें ...

खुली खिड़कियों से बंद दरवाज़ा अक्सर ये बतलाये है

जो तू मेरी ना बनी, तो किसी और की भी ना बनेगी
आज का मजनू roz तेज़ाब लिए लैला को धमकाए है !!
~s-roz~

Tuesday, October 8, 2013

"रिश्ते व प्रेम "

आजकल घर
वातानुकूलित होते हैं
बदलते मौसम का असर
घर पर ............
नहीं होता !
ऐसे एकरस माहौल से
ऊब चुके रिश्ते .....
घर के बंद सांकलों में
अटक कर रह जाते हैं
और उनमे घुट घुट कर ...

जीता " प्रेम "
दरवाजे की महीन झिर्रियों से
बह निकलता है !!!
~s-roz~

Wednesday, September 18, 2013

"हमचू सब्ज़ा बारहा रोईदा-ईम"(हम दूब (हरियाली)की तरह हर बार उगें है )

गए लम्हात के सोये तूफानों में
ख़ामोशी ............
माँ, की तरह एकटक चेहरा देखती रही
वो ,खुश्क आँखों में नहीं
नम आस्तीनों को निहारती रही
उसके सवालात सरकारी वकील थे
और जवाब ..............

जवाब थे ......किसी मुजरिम की मानिंद
उनसे गुरेजां .....!

इन सब से बे-ख़बर
वक़्त तसल्ली का कांधा आगे बढाता है
और राजदाँ हवाओं के मार्फ़त
"रूमी "के बेनजीर लफ़्ज़ों को
मेरे कानों की सीपियों में
गुहर की मानिंद डालता है
"हमचू सब्ज़ा बारहा रोईदा-ईम"
(हम दूब की तरह बार-बार उगे हैं )

के तभी लॉन में खिले
सभी गुलों के रुखसारों पर
तुम्हारी हसीं तब्बसुम तैर गई है
गेराज की खिड़की पर
जो नीले खुबसूरत से अंडे चिड़िया ने सहेजे हैं
एक एक कर के चूजे बाहर आ रहे हैं
जो तुम्हारे लौट आने का संदेशा है
नज़्मों में जो बिम्ब क़ैद किये थे तुमने
अब सब आज़ाद से हवाओं में घुल गए हैं
सारी कायनात एक नज़्म बन गई है
साइंस कहता है के ..................
"वादी में घुली हुई चीज़ जिंदा रहती है अज़ल तक "

~s-roz~
__________________
हमचू सब्ज़ा बारहा रोईदा-ईम---"रूमी "
बेनजीर =अनुपम
गुहर =मोती
गुरेजां=भागता हुआ
तब्बसुम=मुस्कराहट
राजदाँ=मर्मज्ञ,भेद जानने वाला
अज़ल =अनादि काल

Monday, September 9, 2013

"ट्वीट कथाएं " (अथार्थ वो कथायें जो चन्द पंक्तियों में सिमट जाए ) एक कोशिश

ट्वीट-कथा(मैं /तुम) ..........1

सुख,स्नेह एवं संतुष्टि की तृष्णा जाने कहाँ कहाँ नहीं भटकाया ,अंततः स्वयं को एक फकीर के समक्ष पाया ,अपना दुःख उसे सुनाया ..उसने कहाँ अपनी सबसे प्रिय वस्तु का त्याग कर उसका नाम पर्ची पर लिखकर उस  डलिया में डाल दो और उसके बदले उसमे से एक पर्ची उठा लो ! मैंने ठीक वैसा ही किया ...

जो पर्ची मैंने उठाई थी उसमे लिखा था "तुम "और जो पर्ची त्यागी थी उसपर लिखा था "मैं


ट्वीट-कथा("लालबत्ती )...........2
 
वही लालबत्ती, वही औरत और उसके आँचल में लिपटा बच्चा ,तल्ख़ धूप हो कोहरा हो या बारिश,आँखों में नमी लिए वो नज़र आ जाती , उस दिन बारिश में ट्रेफिक जाम की वजह से कुछ ज्यादा पैसे मिल गए थे खिड़की-खिड़की भाग कर भीग चुकी थी और वो बच्चा भी ! दुसरे दिन, वो अपना ख़ाली आंचल फैलाए थी ,आज उसके आंसू में नमक बहुत था !

 

 ट्वीट-कथा ('रजनीगंधा") ..... 3
___________________
उसकी ज़िन्दगी में वो दोनों थे, एक जब भी आता, साथ रजनीगंधा का फूल लाता, उसकी स्निग्ध खुशबू में लीन आँखें बंद कर सपने बुनने लगती ..उनमे खुशबु तो होती मगर कोई रंग नहीं होता .....दूसरा उसके लिए सुर्ख रंगों वाला गुलाब लाता ...उसने ज़िन्दगी में रंग भरने को गुलाब चुना ......ज़िन्दगी की रंगीनियों में उसे अब काँटों का अहसास होने लगा था.... वो भूल गई थी कि, गुलाब के साथ उसकी ज़िन्दगी में कांटे भी तो आयेंगे,..अब उसकी ज़िन्दगी फीकी और आँखे सुर्ख रहने लगी थी .....अब आँखे बंद कर वो रजनीगंधा की खुशबु महसूस करना चाहती थी पर सुर्ख आँखों के कोरों से वो खुशबु बह जाती ....!
काश वो पहले जान पाती कि सफ़ेद रंग में ही वो अपने रंग भर सकती थी जो पहले से रंगीन था उसपर उसका रंग कैसे चढ़ता ?
.........
ट्वीट कथा ("सज़ा)"................ 4
 ________________________
अनु,जिसका वक़्त कभी वक़्त पर नहीं आता! इंतज़ार जैसे उसकी नियति बन गई थी! "सॉरी यार आज फिर लेट हो गया "ये जुमला डेली रूटीन में शुमार था !ऐसे ही किसी एक शाम लेट आने पर उलाहना देते हुए अनु ने मिहीर को चाय पकड़ाई ,चुहल करता हुआ मिहीर कहने लगा "यार तुम प्रेम मुझसे इतना आधिक करती हो थोड़ा इंतज़ार भी कर लिया करो"
 "क्या,थोड़ा इंतज़ार? "ठीक है तुम भी अपनी बची ज़िन्दगी के थोड़े वक़्त के पहले थोडा इंतज़ार करना !तब मैं इसी बालकनी की मुंडेर पर चिड़िया बन तुम्हे देखूंगी ... तब बड़ी जोर से हंसा था मिहीर, चाय प्याली से छलक पड़ी थी उसके कुरते पर "
 अब हर शाम मिहिर बालकनी में चाय लिए उस मुंडेर पर किसी चिड़िया का इंतज़ार करता है गर कोई चिड़िया आकर बैठ जाती है, तो उससे मुखातिब हो यही बुदबुदाता है "यार ये कैसी सज़ा दी तुमने,थोडा इंतज़ार भी नहीं होता मुझसे" कहते वक़्त उसकी चाय खामोश रहती है पर आँखें छलक पड़ती हैं !
 ~s-roz

Monday, September 2, 2013

"शबदेग".../नज़्म

कल सारी रात, तेरे तस्सवुर की भट्टी पर
 
मेरे नज़्मों की, शबदेग पकती रही
तुम्हारे  होने का एहसास
 
भट्टी में ईधन लगाता रहा
 
बारहा, दर्द का धुंआ

आँखों में नमी लाता रहा

हसीं तब्बसुम नज़्मों में कलछी घुमाता रहा

बंद खिड़कियों पर थपकियाँ

बारिश की आमद बताती रही

आंच भभकती रही, ख्वाब ख़दक़ते रहे

देग से उठती हुई इश्क़ की खुशबुओं से

आलम सारा सराबोर था

मेरे बेक़रार सफ़हों को, बेनजीर नज़्मों का इंतज़ार था

मेरी नींद जो अरसों से

पसे-पर्दा थी , ख्वाबे परीशां थी

जाने किस पहर वो भूख से बेज़ार ,नमूदार हुई

शबदेग देख उसके लबों पर तल्ख़ हँसी फिसलती रही

वो ज़ालिम , मेरी नज़्मों का लुकमा निगलती रही

सुबह की पहली किरन ने नींद के जाने की इत्तला दी

उठकर देखा तो ......भट्टी में बची थी राख

और गुमसुम पड़े शबदेग के कोरों में

नज़्मों के कुछ लफ्ज़ चिपके पड़े थे !!

....................................,

आज की रात मैं नींद पर पहरा दूंगी !!!!!

~s-roz~

तस्सवुर =याद

शबदेग =वह हांड़ी जो रातभर पकाई जाती है

बारहा=बहुदा /बार बार

तब्बसुम=मुस्कराहट

बेनजीर =अद्वितीय

पसे-पर्दा=परदे के पीछे /आड़ में

ख्वाबे परीशां =उचटती हुई नींद

नमूदार =आविर्भूत/ प्रकट

लुक़मा =कौर/ निवाला

Thursday, August 29, 2013

रात / ग़ज़ल


दिन-भर की उलझी गुत्थियों से ठिठक जाती है रात
गर धूप मांगे शीतल चांदनी,तो बिदक जाती है रात !

मेरी यादें और तन्हाइयां, तारीक़ियों में सकूं पाती हैं
इक पल को जो मांगूं साथ,तो खिसक जाती है रात ! !

सड़क पर पड़ी घायल आबरू लोगों के लिए तमाशा है
बढ़ाता नहीं कोई अपना हाथ,तो सिसक जाती है रात !

दिन तो आइना है सभी के दर्द नज़र आते हैं सभी को
लेकर मरहम जो बढ़ाऊँ हाथ, तो हिचक जाती है रात !

उधार की रौशनी पर भले ही चाँद गुरुर करता हो मगर
रखने को उसे शफ्फाफ़ और गहरी छिटक जाती है रात !

रंग, मज़हब, वर्ग का फ़र्क तो उजाले में नज़र आता है
पूछ ले गर कोई उसकी जात,तो झिझक जाती है रात !

Saturday, August 24, 2013

ग़ज़ल

नज़र आये तू.. वो नज़र कहाँ
यूं तो हर जगह तू, मगर कहाँ !
 
डूबकर मुझमे, फिर उबर आये तू
दरिया-ए-उल्फत में वो लहर कहाँ !!

मौज़ूद होके मुझसे जुदा रहा वो
इबादत में मेरी....वो असर कहाँ !

मेरी आवाज़ मुझी में लौट आई  
उसतक मेरी गुहार,कारगर कहाँ !

पीकर बन जाए.. फिर मीरा कोई
इबादत के प्याले ..वो ज़हर कहाँ !

तन्हा दिन,तन्हा कटती रातें मगर
परस्तिश से खाली कोई पहर कहाँ !

दरो दीवार ये छत हैं रु-बरु हमसे
कहते हैं इसे घर पर वो घर कहाँ !

मर्ज़-ए-इश्क का इलाज़ बेअसर roz
गोया दर्द बढ़ा है... मुख़्तसर कहाँ !
~s-roz~.......................
मुख़्तसर =कम /short
परस्तिश=आराधना,प्रेम

Friday, August 23, 2013

"रोटी और शौक़"

ख़ुशक़िस्मत हैं वो
जिन्हें उनका शौक़
उन्हें रोटी देता है
वरना मैंने तो
रोटी को ..........
शौक़ का ज़िबह करते ही देखा है
दरअस्ल दोनों का नशा
सर चढ़ कर बोलता है
एक का ख़ात्मा होने पर जिस्म मरता है
और ................
दुसरे के खत्म होने पर
मरती है रूह !
~s-roz~

Monday, August 19, 2013

"ग़ज़ल"

नहीं बतातीं अब कुछ, रौनकें बाज़ारों की
पुलिस की गश्त देती है ख़बर त्योहारों की

जरा सी बारिश शहर को दरिया बना देती है
कारें बेच डालो सख्त जरुरत है पतवारों की

दरवाज़े पर दस्तक अब अच्छी नहीं लगती
फ़िक्र बड़ी रहती है मगर फेसबुकी यारों की

माईक,मेज़ें,कुर्सियों का,है तज़ुर्बा बहुत इन्हें  
लड़े ये सीमा पर,ज़रूरत क्या हथियारों की

लिव इन रिलेशनशिप की बेबाक़ ज़िन्दगी ने
हिलाकर रख दी है नींव भरे-पुरे परिवारों की

पैदल मुमकिन है,दिल्ली कोई दूर नहीं roz
मंज़िल पाने को तरसती है कारें क़तारों की
~s-roz~

Sunday, August 18, 2013

"दूब" हूँ मैं

घनघोर वर्षा हो या हो तपता सूरज
शीतलहरी हो या चले शुष्क आंधी
मुझे अपना अस्तित्व बनाए रखना होता है
मेरी नम्रता बचाए रखती है हमें !
अनुकूल हो या प्रतिकूल
सभी परिस्थितियों में
ढूंढ ही लेतीं हूँ
मार्ग जीवित रहने का
आह! कैसा भाग लेकर जन्मीं हूँ
कभी पैरों तले रौंदा जाना
कभी जूतों से मसले जाना
कभी देवों के सर पर सुशोभित होना
तो कभी शुभगुणों से युक्त
सुहागिन के खोइंछे में डाला जाना
कोई भी शुभकार्य मेरा बिना संभव नहीं
जहाँ नेह की वर्षा होती है, पनप जाती हूँ ,
किन्तु सिमित दायरे में ही पनपना होता है
अन्यथा निर्ममता से कोड़ दी जाती हूँ
कभी जो उपर उठने की चेष्ठा करूँ भी
तो कई धारों के हथियारों से
काट-छांट डाली जाती हूँ .....
समानांतर फैलना भाता है सभी को
किन्तु ऊपर उठना नहीं सुहाता किसी को
फिर भी कितना भी झुकाओ
पुनः उठ खड़ी हो जाती हूँ
अमरत्व का वरदान लेकर आई
"दूब" हूँ मैं .....
इस धरा पर हमारी जात से मिलती एक और जात है
"औरत" जात !!!!!!
~s-roz~
*खोइंछा=दुल्हन या सुहागिन को विदाई के समय शुभ-मंगल दायनी स्वरूप उनके आँचल में हल्दी,दूब.और चावल दिया जाता है !
 

Friday, August 16, 2013

जिनगी बीत गईल ..(भोजपुरी ग़ज़ल )


 जिनगी बीत गईल, एगो इहे आस में
कब चैन के सांस आई,हमरे सांस में !

कईसे पकाईं खीर, जिनगी के आंच में
फाटल दूध खुसी के,दुःख के खटास में !

दिनवा भरवा सुरुजवा,खूब तपावे हमके

सेकिला घाव आपन चंदा के उजास में !

हमार अरजवा उनके,एकहू न सुनाला
ना रहल जोर वईसन हमरे अरदास में !

सोझा से ना,टेढ़ा अंगूरी से काम बनेला
तबेसे लागल बानी,हमहूँ इहे परयास में !
~s-roz~

Tuesday, August 13, 2013

"सजन बिन रतिया(भोजपुरी ग़ज़ल )

सजन बिन रतिया, खूब सतावे हमके
बनके छबि अन्हरवा, भरमावे हमके !

रतिया मा रही-रही निनिया उचीक जाले
झिन्गुरवा उनका नामे,गोहरावे हमके !

अब के सवनवा, ऊ अइहें जरुर एही आसे ...
मन के मोरवा बिन बरखा, नचावे हमके !

ओरी से बहल बयार, देके सनेस उनकर
छुआ के उनकर नेहिया, सोहरावे हमके !

बरखा, धरती अउर असमान के संसर्ग हवे
देखा के ई प्रीत,बुनिया रोज़ जरावे हमके !

मन मत कर थोर आ जईहें सजन तोर
कोठवा पs बईठल काग समुझावे हमके !
~s-roz~-------------------
झिन्गुरवा=झींगुर /अन्हरवा=अँधेरा /गोहरावे=पुकारना /बुनिया =बारिश की बूँद /नेहिया=स्नेह /सोहरावे=सहलाना /कोठवा=छत /मन मत कर थोर =मन छोटा न करना (मुहावरा)

Monday, August 12, 2013

"ई सहर ....(भोजपुरी ग़ज़ल )"


 का भईल जे सुने के खरी-खोटी देला
सहरवे हs जे पेट के रोजी-रोटी देला !

जाके मिल में तू लाख बुनs कपड़ा
ढके खातिर देह, खाली लंगोटी देला !

मेहनत कर के इहाँ नईखे कुछ हासिल
जदि बेचs ईमान तs रक़म मोटी देला !

चौउकाचउंध देख, हसरत जिन पाल
पसारे के पाँव चादर बहुत छोटी देला !

इहाँ गरीबन के रोटी मिले भा ना मिले
अमीरन के कुकुरन के चांप-बोटी देला !

आसान नईखे इहाँ चैन के जिनगी "रोज़"
जिंदा रहे खातिर रोज नया कसौटी देला !!
~s-roz~

Wednesday, July 31, 2013

बावरी, घुंघुरू बंधे मीरा के वो पाँव खोजती है /ग़ज़ल

प्यासी धूप, भरने को घूंट कोई ठांव खोजती है
नादां, तपते सहरा में बादल का गाँव खोजती है !

बेईमानों की बस्ती में... ईमानदारी की उम्मीद
मूरख, दरिया-ए-आग में,मोम की नाव खोजती है !

तरीके अब और भी हैं अपनों की आमद पाने को
पगली, मुंडेर पर ,कौवे की काँव-काँव खोजती है !

दरों पर दरख्त, दरख्तों पर परिंदें नहीं दीखते
भोली, कंक्रीट के वन में पेड़ की छांव खोजती है !

होके मगन नाच उठी थी,इश्क़ में घनश्याम के
बावरी, घुंघुरू बंधे मीरा के वो पाँव खोजती है !

वो दरिया-ए-मोहब्बत,जहाँ परवान चढ़ा था इश्क़
गुस्ताख़,तालिबानी फरमान में चिनाव खोजती है !

हारी हुई बाज़ी से जो बिगड़ी थी,उसे पलटने को
roz, शकुनी के चौसर में आखरी दांव खोजती है !
~s-roz~

Tuesday, July 30, 2013

"ऐसे में कलम का सिपाही" "मुंशी प्रेमचंद याद आता है"

प्रेमचन्द जयंती (३१ जुलाई) पर उन्हें याद करते हुए .....................

समाज की कड़वी हक़ीकतों को भोगने वाला वो अफ़साना निगार जिसके अफ़सानों को आज भी पढ़ने पर ज़ुल्म,भूख,गरीबी,मज़बूरी,के पैरहन में लिपटे किरदार हमारे सामने ज़िंदा हो, ज़ेहन को झकझोर देते है !
हर उम्र,जात और तबके का आदमी उसके अफ़साने में खुद को खड़ा पाता हैं !ऐसा नहीं कि आज का कलमकार इन मौंजू पर नहीं लिखता बेशक लिखता है! अलबत्ते इसी कलम के ज़ोर पे इत्मीनान बख्श शोहरत और पैसे कमाता है! मगर उनमे, मुफ़लिसी जीने और लिखने का फ़र्क साफ़ नजर आता है!!
ऐसे में कलम का सिपाही" "मुंशी प्रेमचंद याद आता है ..........................
.....................................
अपने सपनों के परों को काटकर
नन्हा "हामिद" रोटी से जले......दादी के हाथों पर
चिमटे का मलहम रखता है
वृद्धाश्रम में रहने वाली
जाने कितनी दादियों की नज़रें
अपने "हामिद" को ढूँढती नज़र आती हैं
और "हामिद" अपने से बड़े सपनों के पीछे
भागता नजर आता है .
ऐसे में मुंशी तेरा "ईदगाह" याद आता है !

बदले नहीं है आज भी "बुधिया" के हालात
वो आज भी कमरतोड़ मेहनत कर
परिवार का दोजख भरती है
और थकन से चूर,ज़ुल्म के प्रसव से तड़पती है
और उसका पति........
अपना दिहाड़ी देसी ठेके में गँवाकर
नशे में धुत्त नाली में गिरा नजर आता है
ऐसे मे मुंशी तेरा "कफ़न" याद आता है !

"जालपा" के चन्द्रहार की हसरत,
उसके पति से ग़बन करवाती है
हसरतें, सभी तबक़े की एक सी हैं आज भी
छोटा आदमी बड़ा और ......
बड़ा आदमी और बड़ा होना चाहता है !
बड़ा आदमी बड़े से बड़े घोटाले कर
आसानी से पचा जाता है
छोटा आदमी चंद रुपयों के एवज
चोरी,घूसखोरी,बेइमानी करता पकड़ा जाता है
ऐसे में मुंशी तेरा "ग़बन" याद आता है !

यूँ तो हाक़ीम-हुक़ुमतों औ ज़ालिम-ज़ुल्मतों का
ज़माना ना रहा मगर
अब भी गाँव का "होरी" कर्ज़ के बोझ से लदा,
ज़िन्दगी से खफ़ा नज़र आता है !
वो जो अपनी ज़मीन पर बैल सा जुता नजर आता था
अब अपनी ही ज़मीं पर औरों की इमारत ढोता नजर आता है
और गुज़र करने को खून बेच दो जून की रोटी कमा लाता है
ऐसे में मुंशी तेरा "गोदान" याद आता है !

राजनीति में शोषण,शोषण की राजनीति बदस्तूर जारी है
प्यास से तड़पता जोखू
कुँए का गन्दला पानी पी जाता है
जैसे गरीब बच्चे "मिड-डे-मील"
खाने को मजबूर हो जाते हैं
तब कुएं में मरा जानवर गिर जाता था
अब उनके खाने में
मरी छिपकली और चूहा निकल आता है
ऐसे में मुंशी तेरा "ठाकुर का कुआं" याद आता है !
~s-roz~

Tuesday, July 23, 2013

"फलसफा ज़िन्दगी का "

ज़िन्दगी का गुलदस्ता
धरा था वक़्त के आले में
फूल थे कई किस्म के
सजे थे कांच के प्याले में
रोशनदान की झिर्रियों से
कुछ रौशनी सी आती थी
जैसे अँधेरे के बदन पे
रौशनी की खराशें हो
बारिश के बौछारों से
पत्तियों के कोरों में
...
बूंदें झिलमिलाती थीं
खुश्क गुलों के लबों पर
नमी तैर जाती थी ...
फिर भी .........तीरगी
रूह की मिटी नहीं
कोई नक़शे-पा न मिला
रेंगती रही बस तारीखें
जो रात दिन निगलती थी
बाहर अब भी ......
आफ़ताब झलकता है
छत की मुंडेरों पर
धूप पसर जाती है
चाँद के कटोरे से
चांदनी मय छलकाती है
सुबहो-शाम की परियां
गीत कोई गुनगुनाती हैं
मुद्दतों के बात अब तो
ये बात समझ आई है

ज़िन्दगी वो गुल है जो गुलदस्ते में नहीं खिलता
मन बावरा वो पंछी है जो पिंजरे में नहीं मिलता !
~s-roz~

Tuesday, July 16, 2013

"दिवस के अवसान में "

दिवस के अवसान में
घिरती घटायें घन सी
छेड़ती है तार तन की
विरह का कोई गीत गाऊँ
साँझ का दीया जलाऊँ
बुझे मन के दलान में .....!

काल के मध्याह्न में
तृष्णायें हर क्षण सताती
कामनाएं कुनमुनाती
बांचता है ज्ञान अपना
योग का मन-मनीषी
मोह के उद्यान में........ !

ह्रदय के सिवान में
प्रेम का जो धान रोपा
नेह के न बरसे बादल
नियति ने परोसे हलाहल
भाग्य बैरी सोया रहा
दुर्भाग्य के मचान में ......!

निराशा के मसान में !
चिंता चिताओं सी जल रही
जिजीविषा हाथ मल रही
अँधियारा जो छंटता नहीं
मैं बाँट जोहूँ सूर्य का
आशा के नव-बिहान में !!
~s-roz~
सिवान =खेत

Sunday, July 14, 2013

"अलविदा बे-तार के तार "

किफ़ायत वक़्त और लफ्जों में देता था महरूमी औ मसर्रतकी खबर
हमारे बीच का जो बे-तार का "तार "था, वो आज इतिहास हो गया !!

....
देश में 160 साल पुरानी तार सेवा रविवार से बंद हो गई ,हालाँकि आज के फास्ट युग में उसका कोई औचित्य था भी नहीं फिर भी एक अजीब से मायूसी सी हुई इस खबर को पढ़ते ही !
हमारी पीढ़ी जो न नूतन है न पुरातन ....बल्कि कॉकटेल युग की पैदाईश है इसका सबसे बड़ा फायदा यह ...
है कि हम पुरानी चीजों व मान्यताओं से लगाव भी रखते हैं और नई आधुनिक चीजों व मान्यताओं का पचाव भी कर लेते हैं ....!
इक जमाना था जब डाकिया दरवाज़े पर कागज़ का टुकड़ा लिए जोर से गुहारता था "टेलीग्राम " और घर में क्या अडोस पड़ोस तक में हडकंप मच जाता था ..जने क्या लिखा हो उस मुए तार में .....!
मुझे बचपन की एक घटना याद है .... हम तब कोलकता में रहते थे मेरी नानी सिवान(बिहार ) से आई हुई थी ....एक दिन डाकिया दरवाजे पर जोर से चिल्लाया "टेलीग्राम " नानी वहीँ बरामदे में बैठी मेरे सर इ तेल लगा रही थी ..उनका इतना सुनना था कि पहले एक दो गाली डाकिये को और फिर राग धर कर रोना शुरू ..."अरे हमर रमई के बपई रे मधुबन ई का हो गईल..... एह उमिर में देहिया छोड़ दिहलआआअह्हह्हह अरे मोरे राम जी अब का होईईइ !!!(अरे मेरे रमई के बापू मधुवन (देवर ) जो उनके गाँव आने के समय बीमार चल रहे थे ) इतने कम उम्र में हमें सब को छोड़ कर चले गये हम सब का अब क्या होगा ?)
डाकिया सुन्न सा वहीँ जडवत खड़ा नानी को एक टक देखे जा रहा था कि अचानक ऐसा क्या हुआ .....?मेरी भी हालत कुछ ऐसी ही थी मुझे बस इतना ही समझ आया कि टेलीग्राम बड़ी बुरी चीज होती है ..... तब तक माँ भी किचन से बाहर निकल कर दौड़ी आई नानी को रोता देख वो भी रोने लगी ...! पापा जो ऑफिस जाने के लिए तैयार हो रहे थे रोना सुनकर तुरंत बाहर आये उनकी कुछ प्रतिक्रिया होती उसके पहले ही डाकिये ने झट से तार पकड़ा दिया .... पापा ने एक नजर तार पर लिखे संदेश पर डाली .... उनके चेहरे पर ख़ुशी की लहर दौड़ गई !और माँ-बेटी का रुदन-राग को भंग करते हुए बोले अरे रो क्यों रहे हैं आपलोग मिठाई बांटों रीता(मौसी) को बेटा हुआ है ! इतना सुनना था कि दोनों के रोने को ब्रेक लग गया ....नानी तो दमाद से लजाते हुए के साड़ी के पल्लू से मुहँ ढककर कहने लगीं "नाही पाहून सपना बहुत बाउर देखले रहनी एसे बुझाईल अईसन ( नहीं दामाद जी सपना बहुत बुरा देखा था मैंने इसलिए ऐसा लगा कि खबर बुरी होगी )
ऐसी कई प्रतिक्रियाएं होतीं थी "तार" के आते घर ही क्या पूरा मोहल्ला सकते में आ जाता था !आज की वर्तमान पीढ़ी को इस बात का अहसास ही नहीं होगा कि तार सेवा कितनी खौफनाक और कितनी खुशगवार साबित होती थी। यह टेलीग्राफ सेवा ही थी जिसकी वजह से 1857 का पहला स्वतंत्रता आंदोलन विफल हो गया था। अंग्रेजों ने भारतीयों के दमन के लिए टेलीग्राफ सेवाओं का अपने अफसरों तक सूचना पहुंचाने के लिए जमकर इस्तेमाल किया था !
आज हर कोई मोबाइल, स्मार्टफोन, ईमेल और एसएमएस का इस्तेमाल कर रहा है !!जिसके एवज में सुबह की खबर शाम को बासी हो जाती है ...कभी तेजी से संदेश पहुंचाने का माध्यम रही है टेलीग्राफ की अक्षुण्ण सेवाओं को मेरा शत शत नमन एवं श्रद्दाजलि !!
~s-roz~

Wednesday, July 10, 2013

"ग़ज़ल"

जली रस्सी में बल होते हैं,बल नहीं होता,
तख़्त पे बैठा हर आदमी,सबल नहीं होता !

है ताक़त बहुत, इन भूख के निवालों में,
जज़्बा फाकाकशी का, दुर्बल नहीं होता !

रास्तों में नेकी के, हैं खाइयाँ गहरी बड़ी ,
हौसला उसपे चलने का, प्रबल नहीं होता !

हर्फों,खयालों ने, खूबसूरती से गढ़ा मगर,
कागजों पर बना घर, महल नहीं होता !

रौनकें कहाँ खो गईं है ,क़दीम क़स्बों की,
बहारों में भी गुलज़ार,आजकल नहीं होता!

धमाके दर धमाके वो लाख बरपाए मगर,
इरादा बदी का कभी भी,सफल नहीं होता !

क़ातिलों के जिस्मों में भी तो,वो धडकता है
दिल इनका,मुर्दे देख,क्यों विकल नहीं होता ?

आवाम के संजीदा मस'ले बैठकों में हल होतें हैं
अफ़सोस, उनमे से एक भी, अमल नहीं होता !

यहाँ हादसे इस क़दर,मामूल हो चले हैं "roz,
किसी गमीं पर अब, चश्म सजल नहीं होता !
~s-roz~

Sunday, July 7, 2013

"कुचलो या कुचले जाओगे"

शहरों की भीड़
भीड़ भरी सड़कें
सिमट कर चलते लोग
मंजिल की होड़ में औरों को
तेजी से,पीछे छोड़ते लोग
नज़रें बगल नहीं देखती
और नहीं, ज़मीं देखती हैं
फलक का चमकता सितारा
है मंजिल सभी का
उसी भीड़ के,
हम भी एक हिस्से थे
कुछ दूर ही चल पाए थे
तभी ज़मीर ने झकझोरा
ये किसके ऊपर चल रहे हो ?
जरा देखो तो,
किसको कुचल रहे हो ?
नज़रें ज्यों ही झुकाईं
तो देखा,हम जिस्मों पर चल रहे हैं
सर-ए-राह को मक़तल कर रहे हैं
इक पल को हम,
ये अभी सोच ही रहे थे
अचानक पीछे से तेज़ झोंका आया
और, अगले ही पल
हमने खुद को मंज़िल पे पाया
इस जीत की ख़ुशी हम मनाते
के तभी नजर, आती हुई भीड़ के क़दमों पर गयी
देखा के उन जिस्मों में
मेरा जिस्म भी कुचला जा रहा है
जो रुका नहीं तेज है,
वही बच के चला आ रहा है
अफ़सोस हमें रुकने का नहीं है
पर यूँ मज़िल पर पहुंचना क्या सही है ?
भीड़ तो चीटियों की भी होती है
पर वो क़तार बांध चलती है
"कुचलो या कुचले जाओगे "
ये फलसफा आलिम इंसानों ने बनाए हैं !!
~S-roz~

Wednesday, July 3, 2013

"सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट "

पुरखों ने देखा दमन
भोगा भूख
झेली ज़िल्लत
सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट
की ज़ेद्दोजहद में
सीखा छीनना
चाहा जिंदा रहने का अधिकार
और उनकी भूख ने
असमानताओं को खाते खाते
धर लिया हाथों में
हल की जगह असलहा
मुंह को लग गया खून
अब उनकी जठराग्नि अन्न से नहीं बुझती "
~s-roz~

(झारखण्ड में नक्सलियों द्वारा घेर कर मारे गए एस पी एवं पुलिसकर्मियों को श्रद्धांजली  )

Tuesday, July 2, 2013

ऐ "ताज" तुझे हम कुछ इस नजरिये से देखते हैं "

बे-पनाह खूबसूरती "ताजमहल"की
तस्वीरें जब बयां करने लगती हैं
तब "ताज" मेरी जानिब
सोच का एक कंकड़ फैंकता है
जो कुछ यूँ एहसास कराता है के
"संग-ए-ताज़ "को मरमरी बनाने में
जाने कितने ही "संगसाजों" ने
अपनी महबूबाओं के मरमरी गालों को
खुरदरे हाथों से खुरदरा किया होगा
तभी शायद, रहम दिल शहंशाह ने
कटवा दिए होंगे उनके हाथ ....!
वो तो यमुना थी ....
जो गर्क कर ले गयी पसीने उनके
वरना वहां एक समंदर रहा होता
वो जो "मुमताज़" है
एहसास से परे,मकबरे में सोई है
इस जहाँ से मुख्तलिफ़,किसी और जहाँ में खोई है
उसे भी क्या, इन वाक़यातों का इल्म हुआ होगा ?
उसे तो बस शाहजहाँ के प्रेम ने छुआ होगा
अब तो ये दुनिया की तीसरी मशहूर इमारत है
गैर मुल्की सैलानी भी इसके दीदार को आते है
प्रेमी युगल चाव से वहां तस्वीरें खिंचवाते हैं
हमने आजतलक नहीं देखा है ये "ताजमहल"
बस एक तमन्ना रही है दिल में
गर जो कभी, देखूं भी तो
आंखे बंद किये उसकी मरमरी दीवारों को कुछ यूँ सहलाऊं
के "उनके" रुखसारों पर उभरे,खराशों का एहसास कर पाऊं !!!!
~s-roz~

(आज "दैनिक भाष्कर" में खबर "ताजमहल तीसरा विख्यात स्मारक " पढ़ते हुए हुए उभरे कुछ ख्याल! यूँ तो
विद्रोही शायर "साहिर" ने कहा है कि इक "शहंशाह ने बनवा के हसीं ताजमहल , हम गरीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मज़ाक ....मेरी महबूब कहीं और मिला कर मुझसे...............
और दूसरी जगह कहते हैं कि.. इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताजमहल,
सारी दुनिया को मोहब्बत की निशानी दी है .........:) )

Friday, May 31, 2013

"ग़ज़ल "

जिंदगी में जो पूरा है
दरअसल वो अधूरा है !

ताउम्र जद्दोज़हद क्यूँ
ये जिस्म माटी-धूरा है !

हौसला हो बुलंद गर
वो पत्थर नहीं चूरा है !

चीन दिखता चीनी सा
असल में कन-खजूरा है !

जिसकी अपनी सोच नहीं
वो आदमी नहीं ज़मूरा है !

जिन में वो नहीं होता roz
वो गीत मेरे लिए बेसुरा है !
~s-roz~
 

Thursday, May 30, 2013

"गृहस्थी का कांवर "

परिणय मंडप में धरे दो कलशों में
बराबर ,भरे गए मधुर संबंधों के सभी तत्व
प्रेम, मैत्री, स्नेह और विश्वास
और इससे तैयार हुआ,गृहस्थी का कांवर
यात्रारंभ में जब कंधे की बारी आई
तुम्हारे अहम् ने ...........
उसे अपने कंधे पर रखना स्वीकारा
मैं पथगामिनी ,तुम्हारी सहचर
साथ चलना बदा था
सभी ऋतुओं अवरोधों को पार करते
शिवालय तक !!
प्रारंभ, सूर्योदय की स्निग्ध लालिमा लिए
थकन से दूर ,वानस्पतिक सम्पदा से पूर्ण
उत्सव से भरा अरण्य था !
चलते समय ..........
आगे के घट का छलकना तुम्हे दिखता था
तुम संभल जाते
पीछे का घट ,जो मेरा था
जाने कितनी बार छलका
किन्तु ,वह अदीख था तुम्हारे लिए
जितना छलकती
तापस भूमि पर पड़ते ही ,वाषिप्त हो जाती
और मेघ बन तुम्हारे शुष्क अधरों पर बरस जाती
और नेत्र कोरों के जल के आशय से
उस घट को पुनह भर देती
कारण, कांवर में
दोनों घटों में संतुलन आवश्यक था !
वर्षा ऋतू में जल से भरे मार्ग में
जाने कितनी बार पाँव फिसला तुम्हारा
हर बार कांवर के साथ साथ
तुम्हे संभालते हुए मैं स्वयं आहत हो जाती !
शीत ऋतू में ,तुम्हारे ठिठुरते देह पर
अग्रहायणी की प्रातः धूप सी
तुम्हारे देह पर पसर जाती !
तुम्हारे नंगे पाँव आहत न हों इसलिए
कंटीले मार्ग पर
पतझड़ की मरमरी पत्तियों सी मार्ग पर बिछ जाती !
किन्तु इन सब से अनभिग्य
तुम यदा कदा विस्मृत भी हो जाते हो कि
साथ तुम्हारे मैं भी हूँ ........!
जीवन के इस पड़ाव पर
तुम्हारे मुख पर सूर्यास्त सा मलिन भाव
नहीं देखा जाता ,
यह कांवर तुम्हे बोझ न प्रतीत हो
अतः कुछ देर को,यह मुझे दे सकते हो
किन्तु ओह्ह !! तुम्हारा अहम् !!
प्रिय ,देखो शिवालय की घंटियाँ
सुनाई दे रही हैं !
तुमने अबतक ........
अपने पुरुषत्व को मेरे स्त्रीत्व से मिलाया है ,
क्या ही अच्छा हो कि ......
तुम अपने भीतर के छिपे स्त्रीत्व को
मेरे भीतर के छिपे पुरुषत्व से मिला दो
क्योंकि,शिवालय में बैठे उस अर्धनारीश्वर को
यह जलाभिषेक तभी पूर्ण एवं सफल होगा !!
~s-roz~

Thursday, May 23, 2013

ऐ चाँद ...........(ग़ज़ल )


उतर आओ आसमां से चांदनी के ज़ीने से
तक रहें हैं हम तुम्हें झील के सफीने से !!

झिलमिलाती झील भी आफ़रीं है उस पे
झलक रहा है चाँद निहायत करीने से !!

शब्-ऐ-आख़िर आई है अब मान भी जाओ
जो रूठे हो मुझसे बीते सावन के महीने से !!
 
तुझमें डूबकर न उबर सके तो कोई गम नहीं
मरना बेहतर है तेरे बिन यूँ घुटकर जीने से !!

तेरी हथेलियों में भरी है इश्क़ की चांदनी
कौन रोक सकता है मुझे जी भर के पीने से !!

आब -ऐ -जम-जम है यूँ ज़ाया न करना "roz"
भिगो लेना दामन उसके माथे के पसीने से !!
~s-roz~

Saturday, May 18, 2013

ये शहर ...(ग़ज़ल )


 क्या हुआ सुनने को खरी-खोटी देता है
ये शहर ही है,जो पेट को रोटी देता है !

जाकर मिल में तुम लाख बुनो कपड़े
ढकने को जिस्म, सिर्फ लंगोटी देता है !

मेहनतकश को यहाँ नहीं कुछ हासिल
गर बेचो ईमान,तो रक़म मोटी देता है !
...
चौकाचौंध देख, ज्यादा हसरतें न पाल
पसारने को पाँव, चादर छोटी देता है !

यहाँ गरीबों को रोटी,मयस्सर हो न हो
अमीरों के कुत्तों को,चांप-बोटी देता है !

आसां नहीं पुर-सकूं जीना यहाँ "Roz"
ज़िंदा रहने को,रोज़ नई कसौटी देता है !
~S-roz~

Tuesday, May 14, 2013

"उनके माथे का अरक़,ढलता है टकसालों में"

अनाज बोया गया,दल्ले उगे
खेत सींचा गया ,ख़ुदकुशी उगी

चूल्हे पे रोटी नहीं ,अक्सर ,उठता रहा धुंआ

मुफलिसी की बारिश में सील जाता था ईधन

बच्चों के चेहरों पर ,भूख करती थी नर्तन

उनके माथे का अरक़,ढलता रहा टकसालों में

सिक्के, नाचते रहे अमीरों के पंडालों में

वक़्त अब बदल रहा है ,उनकी जमीं पर

अब अनाज नहीं ,इमारते उगती हैं

उनके हाथों में बीज और खाद नहीं

रेता बजरी के तसले होते हैं

नहीं बदला कुछ तो वो ये के
.......
अब भी उनके माथे का अरक़,
ढलता है टकसालों में !
~S-roz

Sunday, May 12, 2013

"हादसे की रिपोर्ट"

ए सी के ठन्डे बंद कमरे में
जब उबन होने लगी
तो खिड़की के पास आकर
बाहर का नजारा देखने के लिए
पर्दा हटा दिया
क्या देखती हूँ कि
लॉन में .....
बैजंती के कुछ खिले और अधखिले फूल
और कुछ कलियाँ
जो सुबह डाल पर इठला रही थी
...
अभी सूरज की तल्ख़ धूप
और धुत हवसपरस्त लू ने
उन्हें बे आबरू कर जलती जमीन पर
लाशों की मानिंद गिरा दिया है
हवा किसी गीदड़ सी उन लाशों को
पंजे मार कर सूंघ रही है .........!
मैं झट सहम कर
खिड़की को परदे से ढक देतीं हूँ
और ज़ेहन से यही आवाज आती है
"थैंक गॉड" उनमे मैं नहीं
मेरा अपना कोई नहीं था !
कुछ ही देर में .....
ए सी की ठंडक ने
बाहर के जलते हादसे को भुला दिया है
और मैं हाथ में रिमोट लेकर
टी वी के हर न्यूज़ चेनल पर
हादसे की रिपोर्ट देख रही हूँ !
~S-roz~

Tuesday, May 7, 2013

"चौकीदार "

इस मोहल्ले में
रात गए
गली का चौकीदार
जागते रहो ! जागते रहो !
रोज चिल्लाता है ......
घर के लोग
नीम सी नींद में सुनते हैं
और फिर तसल्ली से
करवट बदल
और गहरी नींद सो जाते हैं
... मैं समझ नहीं पाती कि
आखिर ,वो खुद तो जाग रहा होता है
फिर किसको
जागते रहने की चेतावनी देता है ?

ठीक उसी तरह
जैसे कलम का चौकीदार
जागो ,जागते रहो
लिखता रहता है ......
और पढने वाला पढ़कर
पन्ने पलटकर
तसल्ली से
रोजमर्रा के कामों में जुट जाता है
मैं समझ नहीं पाती कि,
आखिर कलम का चौकीदार
किसको जगाने के लिए लिखता है ?
~S-roz~

Thursday, May 2, 2013

"झुर्रियों वाले हाथ जब धरोगे मेरे झुर्री वाले हाथ पर "

कहते हैं ..............,
सपने तो सपने ही होते हैं
क्या पता ,पूरे हो न हों
पर मेरा एक सपना है
जो सच और शीशे की तरह साफ़ है
और वो है तुम्हारा
हर सुबह चाय की प्याली ख़त्म करने के बाद
और रात को सोने से पहले
अपने झुर्रियों वाले हाथ का
मेरे झुर्रियों वाले हाथ पर धरना
और ऐसा करते तुम्हारी नजरें
मेरी नजरों पर नहीं ,हाथों पर होती हैं
जैसे उस हाथ के स्पर्श से कुछ महसूस करना चाहते हो
या कुछ कहना चाहते हो पर कह नहीं पाते
या वो साथ देना चाहते हो
जो वाजिब वक़्त न देकर बेजां किया
अक्सर ,वो आधी रात तक बैठक से ठहाकों का उठना
और मेरा बिस्तर पर खिड़की से आती चांदनी में घुलते रहना
मेरी नींद भी तो तुम्हारी सगी थी
मुझे छोड़ तुम्हारी महफ़िल में कहकहे लगाती
और रात के तीसरे पहर कभी भूले से नींद भी आ जाती
तब तुम्हारा प्यार से उठाकर कहना
यार.जरा दोस्तों के लिए कॉफ़ी बना दो
और उनके सामने छाती चौड़ी कर
उन्हें कॉफ़ी पिलवाना !!
ऊपर वाले की फज़ल से तुम्हारी नौकरी भी एसी कि
आधे से ज्यादा वक़्त बाहर ही रहते !
माँ बनने की पहली ख़ुशी
तुम्हारे संग साझा करना चाहती थी
अफ़सोस नहीं कर पाई !
वो हमारी पहली होली
तुम्हे याद है ?
कहकर गए ,अभी सब से मिलकर आता हूँ
और जब आये तब तक खेल ख़त्म हो चूका था !
खैर ....भूलना चाहती हूँ सब कुछ
और अब तुम्हारे हाथों का स्पर्श पाती हूँ तो
कुछ याद भी नहीं रहता ........
और धर देतीं हूँ अपना दूसरा हाथ तुम्हारे हाथों पर
तुम भी समझ जाते हो
और अपनी प्रेम से लबरेज़ नजरें
ऊपर कर लेते हो
शायद परिपक्व प्रेम
सिफ मौन समझता है ...
मेरा सब कुछ भूलना
लाज़मी भी है ......क्योंकि ,
तुम्हारा वो प्रेम अंगुलिमाल था
और ये प्रेम वाल्मीकि .....!!!
~s-roz~

Friday, April 26, 2013

प्रेम" के फैलाव को स्पेस की दरकार होती है".......(यादें जो अक्सर दस्तक देती हैं ........II )

पहले जब मेरे बाल लम्बे घने थे और खुले बालों से उलझन होने लगती! तो दोनों हाथों को घुमाकर जूड़ा बना लेती थी ! हालाँकि,सिल्की बाल होने की वजह से वो जूड़ा देर तक टिक नहीं पाता और बार बार ऐसा करने पर तुम खीज जाते कहते "खुला ही रहने दो अच्छा लगता है तुमपर" ........! फिर मै उसे खुला ही छोड़ देती .....पर शायद उस जुड़े के साथ ऐसा बहुत कुछ था जिसे मैं बांधना चाहती थी पर उन रेशमी बालों की तरह कभी कायदे से बाँध नहीं पाई ..............!

पर अब सोचती हूँ तो, अपनी नादानी पर हँसी आती है.....ये बात इतने दिनों बाद समझ आई कि गर उस समय उन्हें बाँध लिया होता तो उस बाँध की जकड़ से अब तक कई अनमोल चीजें टूट गईं होती ..........!जिसमे से खास था तुम्हारा "प्रेम "

अब समझ आई ये बात कि प्रेम को पनपने और उड़ने के लिए ढील और स्पेस की दरकार होती है, ठीक उसी पतंग की तरह ......जिसे स्वछन्द और ऊँचा उड़ने के लिए ढील देनी जरुरी होती है .. और प्रेम वो महीन मांझा है जो अद्रश्य सा होते हुए भी पतंग चाहे जितना दूर तक जाए अपने तक खींच ही लाता है बशर्ते रास्ते में कोई कांच का चुरा लगा धार वाला मंझा रास्ता न काट दे ..:)

प्रेम के पनपने को आपसी ऐतबार को विस्तार देना निहायत जरुरी है .......हालाँकि न चाहते हुए भी कई दफे इस गहरे एतबार ने नींद से झिंझोड़ डाला ,लगा इतना ऐतबार शायद मेरी गलती थी ......!

लगा के हालात के नावेल निगार ने ज़िन्दगी के नावेल में कुछ पन्ने गैर जरुरी ,बेमतलब डाल दियें हों जिसके बगैर भी कहानी पूरी हो सकती थी ..पर हर नावेल निगार अपनी कहानी को दिलचस्प बनाने के लिए कहानी में कुछ टर्निंग पॉइंट लाता ही है , और सच भी तो है वो मेरी ज़िन्दगी का टर्निंग पॉइंट ही तो था ...!

पर शुक्र है उस परवरदिगार का, जो उसने मेरा हौसला टूटने न दिया ...गर जरा भी कमजोर पड़ी होती तो आज नतीजा बहुत ही भयावाह हो सकता था !अपने अहम् को ताक़ पर रख थोडा सब्र और थोडा हौसला ही तो चाहिए होता है...... अपने घरौंदे को बचाने के लिए ..........!

नावेल के उन तारीक पन्नो को मैंने एकसाथ कर आलपिन से जड़ दिया है ताकि कभी उस नावेल को दुबारा पढना चाहूँ तो भूले से भी वो सफहें न खुलें ....:) और बाकि के उन खुशरंग पन्नो पर तुम्हरे लिखे उन खतों को बुक-मार्क बनाकर लगा दिया है .................ताकि जब भी खोलू तो तुम्हारे साथ बीताये उन्ही खुशगवार लम्हों के खुश लम्स गोद में पहुच जाऊं !

 बस उस नोवेल निगार से यही इल्तजा है, के इस नावेल के आखिरी पन्ने का क्लाईमेक्स पढ़ते वक़्त तुम्हारा हाथ मेरे हाथ में रहे ..तुम तो जानते ही हो मुझे कहानी का दुखद अंत कतई पसंद नहीं !

 ~S-roz~

Wednesday, April 17, 2013

"मानव सभ्यता चूहों की कब्र पर खड़ी है ,


अभी कल के अखबार में ही तो पढ़ा था ..अब इंसान की ख़राब किडनी को फिर से ठीक कर प्रत्यारोपित किया जा सकेगा ......इस सफल प्रयोग का पूरा श्रेय चाहें डॉक्टर्स लें पर मेरी नजर में तो वो निरीह: चूहें हैं जिन्होंने जाने कितने ही ज़ुल्म जलालतों को सह कर और शायद कितनी ही शहदातें देकर इस अज़ीम काम को अंजाम दिया होगा ......... !...
कभी कभी सोचती हूँ, कि गर ये चूहें न रहे होते तो हमारी तादाद और उम्र कितनी कम होती .....जानलेवा बीमारियों से निजात ,खुबसूरत और जवां दिखने के तरीके ,मन के विज्ञानं और व्यवहार को समझने ,और न जाने कितनी असम्भव चीजों को सम्भव बनाया है ......इन चूहों ने !
और ये बताने की जरुरत नहीं कि इसके एवज चूहों ने जने क्या क्या नहीं झेला होगा ...सच है ना ,
ज़िंदा रहने की होड मे मरते लोग
खुद को बचाने के एवज़
औरों का क़त्ल करते लोग .................! एक तरह से यह कहना बेजां न होगी कि .......

"मानव सभ्यता चूहों की कब्र पर खड़ी है ,
खैर जो है सो है ............. !
इससे एक बात और ज़ेहन में उभरी कि देश की ७०% जनता वो चूहे ही तो हैं ................
जिनपर प्रयोग पर प्रयोग किये जाते हैं ....और गर प्रयोग करने वाले जीत गये तो क्या कहने
हारे भी तो बाज़ी मात नहीं .................!
तभी तो विश्व के धनाढ्य लोगों में हमारे देश के लोगों का भी नाम आ ही जाता है ..ये कोई मामूली बात नहीं ...चाहें गरीबी की रेखा जमीन से चिपकी चल रही हो ..................वो कहते हैं न ..........
बड़े लोगों को
बड़ा बनाने के लिये
होना होता है
छोटे लोगों को
और .....
और भी छोटा !!!
~s-roz~

"अभी जो आया भूकंप"

अभी जो आया भूकंप, काँप गयी धरती भी
रौंदा गया है इतना के हांप गयी धरती भी !

हमारी कारस्तानियों का कोई हिसाब नहीं
इसका लेखा जोखा नाप गयी धरती भी !

पुत्र कुपत्र भले हो माता कुमाता नहीं होती
खुराफातों को ममता से ढांप गई धरती भी !

देखकर आतंक के साए अपने बदन पर 
विश्वशांति के मन्त्र जाप गई धरती भी !

जब होगा असंतुलन धरा पर,बरसेगा कोप
ऐसा सभी को प्रेम से श्राप गई धरती भी !!!
~s-roz~

Sunday, April 7, 2013

"एकै चाक के माटी हम सब "


सखी री ....,
एकै चाक के माटी हम सब
कुछ गढ़ी कुछ टूट गईं
कुछ बची कुछ फूट गईं
कुछ संभली कुछ छूट गईं
कुछ कच्ची कुछ सूख गईं 
कुछ पलीं कुछ मारी गईं
कुछ बिगड़ीं कुछ संवारी गईं 
कुछ हलके कुछ भारी  गईं 
कुछ जीतीं कुछ हारी गईं  
कुछ सच्ची कुछ झूठी गई
कुछ छुटीं कुछ लूटीं गईं 
 कुछ कुंवारी कुछ ब्याही गईं
कुछ सादे कुछ शाही गईं 
कुछ भरी कुछ  रीत गईं
 सबही की जिनगी बीत गई
सखी री ....,
एकै चाक के माटी हम सब
कुछ गढ़ी कुछ टूट गईं !!!!!
~s-roz~