अधूरे ख्वाब


"सुनी जो मैंने आने की आहट गरीबखाना सजाया हमने "


डायरी के फाड़ दिए गए पन्नो में भी सांस ले रही होती है अधबनी कृतियाँ, फड़फडाते है कई शब्द और उपमाएं

विस्मृत नहीं हो पाती सारी स्मृतियाँ, "डायरी के फटे पन्नों पर" प्रतीक्षारत अधूरी कृतियाँ जिन्हें ब्लॉग के मध्यम से पूर्ण करने कि एक लघु चेष्टा ....

Thursday, May 23, 2013

ऐ चाँद ...........(ग़ज़ल )


उतर आओ आसमां से चांदनी के ज़ीने से
तक रहें हैं हम तुम्हें झील के सफीने से !!

झिलमिलाती झील भी आफ़रीं है उस पे
झलक रहा है चाँद निहायत करीने से !!

शब्-ऐ-आख़िर आई है अब मान भी जाओ
जो रूठे हो मुझसे बीते सावन के महीने से !!
 
तुझमें डूबकर न उबर सके तो कोई गम नहीं
मरना बेहतर है तेरे बिन यूँ घुटकर जीने से !!

तेरी हथेलियों में भरी है इश्क़ की चांदनी
कौन रोक सकता है मुझे जी भर के पीने से !!

आब -ऐ -जम-जम है यूँ ज़ाया न करना "roz"
भिगो लेना दामन उसके माथे के पसीने से !!
~s-roz~

4 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार(25-5-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
    सूचनार्थ!

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  2. भावों का अनुपम संयोजन ...

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  3. सभी शेर लाजवाब हैं
    अनुशरण कर मेरे ब्लॉग को अनुभव करे मेरी अनुभूति को
    latest post: बादल तू जल्दी आना रे!
    latest postअनुभूति : विविधा

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