अधूरे ख्वाब


"सुनी जो मैंने आने की आहट गरीबखाना सजाया हमने "


डायरी के फाड़ दिए गए पन्नो में भी सांस ले रही होती है अधबनी कृतियाँ, फड़फडाते है कई शब्द और उपमाएं

विस्मृत नहीं हो पाती सारी स्मृतियाँ, "डायरी के फटे पन्नों पर" प्रतीक्षारत अधूरी कृतियाँ जिन्हें ब्लॉग के मध्यम से पूर्ण करने कि एक लघु चेष्टा ....

Thursday, October 10, 2013

"ग़ज़ल"

घाट की चढ़ती सीढ़ी तेरी, तुझे आसमां दिखलाए है
उतरती सीढ़ी मेरी जो पानी में आसमां झलकाए है

यहीं हमारा ठौर-ठिकाना, अब यही हमारी दुनिया है
पिंजरे की चिड़िया  दूजे को हरपल यही समझाए है

कूड़े के कचरे में लिपटी, अधमरी, नंगी, भूखी बच्ची
रो रो कर जाने वो किसको अपनी फरियाद सुनाए है

रखना बंद वरना बिगड़ जायेंगी घर की सभी तहजीबें ...

खुली खिड़कियों से बंद दरवाज़ा अक्सर ये बतलाये है

जो तू मेरी ना बनी, तो किसी और की भी ना बनेगी
आज का मजनू roz तेज़ाब लिए लैला को धमकाए है !!
~s-roz~

14 comments:

  1. "आज का मंजनू तेज़ाब लिए लैला को धमकाए है"

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    1. सादर आभार आपका राकेश जी .नवरात्रि और विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनायें


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  2. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (11-10-2013) को " चिट़ठी मेरे नाम की (चर्चा -1395)
    "
    पर लिंक की गयी है,कृपया पधारे.वहाँ आपका स्वागत है.
    नवरात्रि और विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनायें

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    1. सादर आभार राजेन्द्र जी ,नवरात्रि और विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनायें आपको भी


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  3. यहीं हमारा ठौर-ठिकाना, अब यही हमारी दुनिया है
    पिंजरे की चिड़िया दूजे को हरपल यही समझाए है ...

    दिल को छूता है ये शेर ... लाजवाब ...

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  4. सादर आभार आपका दिगंबर जी ..

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  5. बहुत खुबसूरत रचना अभिवयक्ति.........

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  6. आभार सुषमा जी ,

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  7. बहुत खूब ....
    सुरS
    mankamirror.blogspot.in

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  8. सादर आभार सुरेश जी

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  9. बहुत बढ़ि‍या गज़ल

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया रश्मि

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया प्रदीप जी

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