अधूरे ख्वाब


"सुनी जो मैंने आने की आहट गरीबखाना सजाया हमने "


डायरी के फाड़ दिए गए पन्नो में भी सांस ले रही होती है अधबनी कृतियाँ, फड़फडाते है कई शब्द और उपमाएं

विस्मृत नहीं हो पाती सारी स्मृतियाँ, "डायरी के फटे पन्नों पर" प्रतीक्षारत अधूरी कृतियाँ जिन्हें ब्लॉग के मध्यम से पूर्ण करने कि एक लघु चेष्टा ....

Sunday, October 18, 2015

जंगल राज


इस शहर के लोग 
जो खुली आँखों से सोतें है 
और बंद आँखों से जागतें है 
अब मुर्गे की बांग से नहीं 
मज़हबी बांग से जागकर
अंधी दौड़ में शामिल हो जाते हैं

ऐसे आलिम इंसानों के 
कानून के क़ायेदे.. फ़ाख्ता हैं 
इस शहर में अब तो....
जंगल राज ही नाफ़िज़ हो 
कम से कम...
उनके अपने क़ायदे कानून तो होते हैं ?

गर कोई सैलाब आये तो 
शेर, गाय, बकरी और चीता 
गिद्ध, गिलहरी सांप और तोता 
साथ एक ही नाव(नोवा) में होते हैं

अँधेरे में जब सहम जाते हैं 
बया के घोंसले के चूज़े 
तब वन के जुगनू जगमगाकर 
उन्हें रौशनी का हौसला देतें हैं

गर पेट भरा हो शेर का तो 
वो कभी हमला नहीं करता
सभी परिंदे और चरिंदे
अमन के गीत गाते हैं

कोयल अपना ठिकाना नहीं बनाती 
उसके अंडों को भी कव्वे 
अपनी जात का ही समझ 
अपने परों की गर्मी देते हैं 
इस शहर में जंगल राज ही नाफ़िज़ हो 
कम से कम......
उनके अपने क़ायदे कानून तो होते हैं
?
~s-roz~

6 comments:

  1. Replies
    1. हार्दिक आभार राकेश जी

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    2. हार्दिक आभार राकेश जी

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  3. सरोज जी आपकी इस कविता में एक प्रकार का जो सामाजिक चित्रण किया है जिसमे सब अपने स्वार्थ भाव से जीवन यापन कर रहे हैं आपका शीर्षक "जंगलराज " बहुत ही अच्छा है आप इसी प्रकार से अपनी कविताओं को
    शब्दनगरी पर भी प्रकाशित कर सकती हैं .........

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