अधूरे ख्वाब


"सुनी जो मैंने आने की आहट गरीबखाना सजाया हमने "


डायरी के फाड़ दिए गए पन्नो में भी सांस ले रही होती है अधबनी कृतियाँ, फड़फडाते है कई शब्द और उपमाएं

विस्मृत नहीं हो पाती सारी स्मृतियाँ, "डायरी के फटे पन्नों पर" प्रतीक्षारत अधूरी कृतियाँ जिन्हें ब्लॉग के मध्यम से पूर्ण करने कि एक लघु चेष्टा ....

Tuesday, July 23, 2013

"फलसफा ज़िन्दगी का "

ज़िन्दगी का गुलदस्ता
धरा था वक़्त के आले में
फूल थे कई किस्म के
सजे थे कांच के प्याले में
रोशनदान की झिर्रियों से
कुछ रौशनी सी आती थी
जैसे अँधेरे के बदन पे
रौशनी की खराशें हो
बारिश के बौछारों से
पत्तियों के कोरों में
...
बूंदें झिलमिलाती थीं
खुश्क गुलों के लबों पर
नमी तैर जाती थी ...
फिर भी .........तीरगी
रूह की मिटी नहीं
कोई नक़शे-पा न मिला
रेंगती रही बस तारीखें
जो रात दिन निगलती थी
बाहर अब भी ......
आफ़ताब झलकता है
छत की मुंडेरों पर
धूप पसर जाती है
चाँद के कटोरे से
चांदनी मय छलकाती है
सुबहो-शाम की परियां
गीत कोई गुनगुनाती हैं
मुद्दतों के बात अब तो
ये बात समझ आई है

ज़िन्दगी वो गुल है जो गुलदस्ते में नहीं खिलता
मन बावरा वो पंछी है जो पिंजरे में नहीं मिलता !
~s-roz~

8 comments:

  1. आपने लिखा....
    हमने पढ़ा....
    और लोग भी पढ़ें;
    इसलिए बुधवार 24/07/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in ....पर लिंक की जाएगी.
    आप भी देख लीजिएगा एक नज़र ....
    लिंक में आपका स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  2. बहुत बहुत शुक्रिया यशोदा जी ..!

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  3. बहुत अच्छी रचना...

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    1. सादर आभार वीणा जी

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  4. जिंदगी खुले आसमां के नीचे ... प्रेम और दीवानेपन मिएँ डूब कर ही मिलती है ...
    लाजवाब रचना ...

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    1. सादर आभार श्री दिगंबर जी !

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  5. भावो को खुबसूरत शब्द दिए है अपने.....

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  6. सादर आभार सुषमा जी !

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