अधूरे ख्वाब


"सुनी जो मैंने आने की आहट गरीबखाना सजाया हमने "


डायरी के फाड़ दिए गए पन्नो में भी सांस ले रही होती है अधबनी कृतियाँ, फड़फडाते है कई शब्द और उपमाएं

विस्मृत नहीं हो पाती सारी स्मृतियाँ, "डायरी के फटे पन्नों पर" प्रतीक्षारत अधूरी कृतियाँ जिन्हें ब्लॉग के मध्यम से पूर्ण करने कि एक लघु चेष्टा ....

Monday, August 12, 2013

"ई सहर ....(भोजपुरी ग़ज़ल )"


 का भईल जे सुने के खरी-खोटी देला
सहरवे हs जे पेट के रोजी-रोटी देला !

जाके मिल में तू लाख बुनs कपड़ा
ढके खातिर देह, खाली लंगोटी देला !

मेहनत कर के इहाँ नईखे कुछ हासिल
जदि बेचs ईमान तs रक़म मोटी देला !

चौउकाचउंध देख, हसरत जिन पाल
पसारे के पाँव चादर बहुत छोटी देला !

इहाँ गरीबन के रोटी मिले भा ना मिले
अमीरन के कुकुरन के चांप-बोटी देला !

आसान नईखे इहाँ चैन के जिनगी "रोज़"
जिंदा रहे खातिर रोज नया कसौटी देला !!
~s-roz~

3 comments:

  1. Replies
    1. आभार सुषमा जी

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  2. बहुत खूबसूरत रचना, ज़िंदगी से रूबरू करवाती इस ग़ज़ल के लिए आभार

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