अधूरे ख्वाब


"सुनी जो मैंने आने की आहट गरीबखाना सजाया हमने "


डायरी के फाड़ दिए गए पन्नो में भी सांस ले रही होती है अधबनी कृतियाँ, फड़फडाते है कई शब्द और उपमाएं

विस्मृत नहीं हो पाती सारी स्मृतियाँ, "डायरी के फटे पन्नों पर" प्रतीक्षारत अधूरी कृतियाँ जिन्हें ब्लॉग के मध्यम से पूर्ण करने कि एक लघु चेष्टा ....

Friday, February 3, 2012

"रिश्ते और कपडे "

"रिश्तों के मैले कपडे आजकल
अना की वाशिंग मशीन में धुलते हैं
जो  साफ तो हो जातें  हैं
पर कुछ चक़त्ते  रह जाते हैं
जिन्हें "सब्र हाथों" से ही रगड़कर
साफ करना होता है
मशीन से धुले कपड़ों में,
शिकवे ,शिकायतों की
शिकनें भी बहुत पड़तीं है
जो शिद्दत  की हलकी इस्त्री से
मिटती भी नहीं .....
बहरहाल ...........
दिल की तसल्ली को
कपडे बदल भी दें
मगर रिश्तों को कैसे ........?
~~~S -ROZ ~~~
 

16 comments:

  1. बिल्कुल सही कहा।

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  2. सुन्दर प्रस्तुति ..नए बिम्ब प्रयोग किये हैं

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  3. बहुत ही बढ़िया।


    सादर
    ---

    जो मेरा मन कहे पर आपका स्वागत है

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  4. वंदना जी .संगीता जी ,यशवंत जी आपकी प्रतिक्रिया एवं सराहना महत्वपूर्ण है आभार !!

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  5. नया बिम्ब...सुन्दर कविता !!

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  6. रिश्तो का कटु सत्य.....

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  7. निधि एवं सुषमा जी .......ह्रदय से आभार आप दोनों का

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  8. क्या बात है जी ........

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  9. कल 27/02/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  10. बहुत अच्छे भाव लिए कविता |वैसे आज कल रिश्ते भी कपड़ों की तरह ही बदलते रहते हैं |
    आशा

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  11. नवीन विम्बों की नज़र से रिश्तों को देखती सुन्दर अभिव्यक्ति!

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  12. रिश्तों में दाग अच्छे नहीं होते....

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  13. रिश्तों के इन कपड़ों को सहेजना वाकई बहुत मुश्किल होता जा रहा है ! कोई न कोई दाग या शिकन रह ही जाती है जिसे मिटाना नामुमकिन हो जाता है ! बहुत ही सुन्दर रचना ! शुभकामनायें !

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  14. कम शब्दों में बहुत कुछ कह दिया !
    अदभुत रचना ! बधाई

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  15. बहुत सुन्दर, हटकर....सशक्त अभिव्यक्ति !

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