अधूरे ख्वाब


"सुनी जो मैंने आने की आहट गरीबखाना सजाया हमने "


डायरी के फाड़ दिए गए पन्नो में भी सांस ले रही होती है अधबनी कृतियाँ, फड़फडाते है कई शब्द और उपमाएं

विस्मृत नहीं हो पाती सारी स्मृतियाँ, "डायरी के फटे पन्नों पर" प्रतीक्षारत अधूरी कृतियाँ जिन्हें ब्लॉग के मध्यम से पूर्ण करने कि एक लघु चेष्टा ....

Sunday, April 17, 2016

बैसाख आने को है

                       

चैत में चित पड़ीं हुई हैं ज़र्द पत्तियां

शाखों पर सब्ज़ कोपलें

ले रही हैं अंगड़ाइयां

बिरहन हवा के आंचल में

क़ैद हुए ज़र्द पत्ते

शोर-ओ-गुल में मुब्तला हैं

शायद अपने आखिरी अंजाम से डरते हैं

उन्हें अब हवा की ज़द में ही

सोना और जगना है

अपने दर्द को ज़ब्त कर

सर्द रातों में सुलगना है

सूरज के सुनहले गेसू

हर जगह तारी है

हवा औ सूरज में

कानाफूसी जारी है

जो हौले से

मेरे कानों को जतलाता है 

बैसाख आने को है

ये बतलाता है                       

बैसाख के अंगने में

गेहूं की बालियाँ

पककर सुनहली हो चलीं हैं ....

वाक़ई ! बाज़ार में

ये बालियाँ सोने की हो जायेंगी

ललचाता सा मेरा किसान दिल

हिदायती लह्ज़े में मुझसे कहता है

"रोज़! सहेज लेना सोने की बालियाँ

बेटी के ब्याह को काम आएँगी !

 

 

 

 

 

 

11 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" सोमवार 18 अप्रैल 2016 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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    1. सादर आभार आपका यशोदा जी

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  2. बहुत खूब...सहेज लेना सोने की बालियाँ...

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    1. हार्दिक आभार वाणभट्ट जी

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  3. Replies
    1. हार्दिक आभार राकेश जी

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    2. हार्दिक आभार राकेश जी

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    3. हार्दिक आभार राकेश जी

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    4. हार्दिक आभार राकेश जी

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  4. direct selling marketing mile stone for every youngster

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