अधूरे ख्वाब


"सुनी जो मैंने आने की आहट गरीबखाना सजाया हमने "


डायरी के फाड़ दिए गए पन्नो में भी सांस ले रही होती है अधबनी कृतियाँ, फड़फडाते है कई शब्द और उपमाएं

विस्मृत नहीं हो पाती सारी स्मृतियाँ, "डायरी के फटे पन्नों पर" प्रतीक्षारत अधूरी कृतियाँ जिन्हें ब्लॉग के मध्यम से पूर्ण करने कि एक लघु चेष्टा ....

Saturday, January 25, 2014

"उसे मारो "

चाहते हो गर 
सियासत की सांस 
बदस्तूर चलती रहे
तो उसे मारो 
तल्ख़ अल्फाजों से 
उसे लानत भेजो 
उसपर जुमले कसो 
उसकी कमर तोड़ो 
उसकी रीढ़ तोड़ो 
ताकि वो
सदा के लिए
मुख़ालिफ़ हवाओं में
तनकर खड़ा होना
और सर बुलंद किए
चलते रहना
भूल जाए 
गर वो कुछ दिन और 
तन कर सीधा चला 
तो बरसो का खड़ा किया 
सियासी महल 
नेस्तनाबूद हो सकता है !
!
~s-roz~
गोया हम कोई काम भला तो करते नहीं और जो कोई करने की ठाने भी तो उसकी खैर-ओ ख्वाह में कोई कसर भी नहीं छोड़ते ...है की नहीं ?:)

8 comments:

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    1. हार्दिक आभार देवेन्द्र पाण्डेय जी

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    1. हार्दिक आभार वाणभट्ट जी

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    2. हार्दिक आभार वाणभट्ट जी

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  3. भावो को खुबसूरत शब्द दिए है अपने...

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    1. हार्दिक आभार सुषमा जी

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