अधूरे ख्वाब


"सुनी जो मैंने आने की आहट गरीबखाना सजाया हमने "


डायरी के फाड़ दिए गए पन्नो में भी सांस ले रही होती है अधबनी कृतियाँ, फड़फडाते है कई शब्द और उपमाएं

विस्मृत नहीं हो पाती सारी स्मृतियाँ, "डायरी के फटे पन्नों पर" प्रतीक्षारत अधूरी कृतियाँ जिन्हें ब्लॉग के मध्यम से पूर्ण करने कि एक लघु चेष्टा ....

Friday, March 7, 2014

ज़ारबंद ______महिला दिवस पर विशेष

थाने मे ...
बेंच के कोने पर 
ज़ख्म से बेज़ार 
गठरी बनी घायल लड़की
सिकुड़ी,सहमी सिसकती है
घूरती नज़रें उसके ज़ख्मों को 
और भी गहरा कर देती हैं 
उसकी माँ बौख़लाई सी 
उनके, कब, कहाँ, कितने, कैसे
जैसे सवालों का 
जवाब देती हुई, दर्ज़ करा देती है 
उन दरिंदों के ख़िलाफ़ 
ऍफ़ आई आर !

अस्पताल के ....
जनाना जनरल वार्ड में 
मुश्किल से बेड मयस्सर हुआ है 
वार्ड बॉय, नर्स और मरीज़ों में 
फुसफुसाहट जारी है 
एक के बाद एक डाक्टर 
जिस्म के ज़ख्मों का 
अपने-अपने तरीके
से जांच करता हैं 
मन का जख्म
जो बेहद गहरा है 
वो किसी को नहीं दिखता 
और इस तरह 
तैयार हो जाती है 
बलात्कार की 
मेडिकल रिपोर्ट !

अदालत में ...
अभियोगी वकील बे-मुरउव्वत हो 
उससे सवाल पर सवाल दागता है 
कब, कहाँ, कितने, कैसे 
वो घबराहट और शर्म से
बेज़ुबान हो जाती है 
जवाब आंसुओं में मिलता है 
उसका वकील 
उसके आँसू पोंछते हुए कहता है 
जनाब-ए-आली ये सवाल ग़ैर-ज़रूरी है 
अदालत वकील पर एतराज़ कर 
उसके आँसू खारिज़ कर देता है 
आँसू रिकॉर्ड-रूम में चले जाते हैं 
हर पेशी तक उसकी माँ 
उम्मीद का एक शॉल बुन लेती है  
और अदालत बर्ख़ास्त होने तलक़
वो तार-तार उधड़ जाता है 

अब वो .......
खाक़ी, सफ़ेद, और काले रंग से 
बेहद ख़ाहिफ़ है 
विभिन्न कोणों के पैमाने  पर 
उन रंगों ने उसे, लड़की से 
ज्यामिति बना दिया 
जिसे केवल ...
जांचा, नापा, परखा जा सकता है 
उसे अब लड़की बनने नहीं देता
उस भयावह घटना को 
वो वक़्त की खिड़की से 
परे ढकेल देना चाहती है 
पर समाज और हालात 
उसे भूलने नहीं देते !

अब वो स्कूल नहीं जाती 
मां के सिवा किसी को भी 
याद नहीं उसका नाम 
पीड़िता,रेप वाली लड़की, विक्टिम 
कई नाम दे दिए गए है उसे 
माँ अब लोगों के घरों में 
काम करने नहीं जाती 
अब वो घर में ही 
सिलती है, औरतों के पेटीकोट 
और बगल में बैठी वो 
डालती जाती है 
उन पेटीकोटों में ज़ारबंद 
और दांत भींच कर 
कस कर लगा देती है उनमे गांठ 
जैसे कोई जल्दी खोल ही न पाए !

वक़त उनके लिए थम सा गया है 
बस दीवार पर 
टंगी केलेंडर की तारीख़ बदलती है 
बावजूद इसके 
माँ अब भी 
अगली पेशी के लिए 
बुन रही है 
उम्मीद की इक शॉल !!
~s-roz~

4 comments:

  1. माँ अब भी
    अगली पेशी के लिए
    बुन रही है
    उम्मीद की इक शॉल !!.....:(

    ReplyDelete
    Replies
    1. आभार उपासना जी

      Delete
  2. जबरदस्त...मर्मस्पर्शी रचना...

    ReplyDelete
    Replies
    1. आभार वाण भट्ट जी

      Delete