अधूरे ख्वाब


"सुनी जो मैंने आने की आहट गरीबखाना सजाया हमने "


डायरी के फाड़ दिए गए पन्नो में भी सांस ले रही होती है अधबनी कृतियाँ, फड़फडाते है कई शब्द और उपमाएं

विस्मृत नहीं हो पाती सारी स्मृतियाँ, "डायरी के फटे पन्नों पर" प्रतीक्षारत अधूरी कृतियाँ जिन्हें ब्लॉग के मध्यम से पूर्ण करने कि एक लघु चेष्टा ....

Wednesday, November 3, 2010

""अबके दिवाली " "

 

"पहले के जैसे लोग थे,वैसे सामान भी हुआ करते थे 

त्योहारों  पर लोग क्या  दिलखोल कर मिला करते थे!!

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मिटटी के चराग कतारों में क्या खूब जला करते थे

मचलती सी लौ फ़ना होने तक रौशनी बिखेरती थी!!

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अबके "बिजली के बुलबुले' और लोग एक से हो गए हैं  

चेहरे पर नकली हसी और रश्क लिए गले मिला करते हैं

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एक 'स्विच' की मोहताज़ ये बुलबुलें  फ़ना नहीं होती

बेजान सी रौशनी देते हुए हर साल यही जला करती है" !!

6 comments:

  1. दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं..

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  2. सरोज बहन सही कहा अगर पहले के जेसे लोग और पहले के जेसा शुद्ध सामन मिल जाए तो बस मन,वचन,कर्म के अलावा वातावरण और खाध्य पदार्थ भी शुद्ध हो जाएँ आपने भुत अच्छी प्रस्तुती की हे मुबारक हो. अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

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  3. खूब चित्रण किया है बीस वर्ष पहले की दीपावली का..वर्ड वेरीफिकेशन..

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  4. आपको भी दिवाली की शुभकामनायें .... सादर

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  5. सरोज जी,

    बहुत सुन्दर रचना .....बिजली के ब्लाबो की उपमा बिजली के बुलबुले....वाह
    आज और कल पर एक व्यंग्य समेटे है आपकी रचना......कुछ मात्रात्मक गलतियाँ दिखीं हो सके तो दुरुस्त कीजियेगा.....जैसे मिट्टी, चिराग, हँसी |

    आपको और आपके प्रियजनों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें......

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