अधूरे ख्वाब


"सुनी जो मैंने आने की आहट गरीबखाना सजाया हमने "


डायरी के फाड़ दिए गए पन्नो में भी सांस ले रही होती है अधबनी कृतियाँ, फड़फडाते है कई शब्द और उपमाएं

विस्मृत नहीं हो पाती सारी स्मृतियाँ, "डायरी के फटे पन्नों पर" प्रतीक्षारत अधूरी कृतियाँ जिन्हें ब्लॉग के मध्यम से पूर्ण करने कि एक लघु चेष्टा ....

Wednesday, January 5, 2011

"प्यार का पत्थर ,

"हमने हर इंसान के गुनाहों पर 
जलालतों  के पत्थर बड़े  फेकें हैं
पर क्या कभी एक प्यार का पत्थर ,
दिल के उस दरवाजे पर फेंका है,
जहाँ एक 'खुदा' सो रहा है ?
'वलियों' से सुनते आए हैं के
हर इंसान में 'खुदा' होता है ,
फिर हम क्यूँ उसके हैवानियत को हवा देते है?
उसके भीतर के खुदा को क्यूँ नहीं जगा देते है?
कही ना कही हम खुद भी गुनहगार है उसके " 
~~~S-ROZ~~~
 
 
 
 
 
 
 

 

5 comments:

  1. सरोज जी,

    सुभानाल्लाह....बहुत खूब और बहुत सच कहा है आपने|

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  2. कहते तो ऐसे ही हैं की "हर इंसान में खुदा होता है" इसलिए आपका प्रश्न जायज है - नव वर्ष २०११ की मंगल कामना

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  3. आपको भी नववर्ष की ढेरों शुभकामनायें व आभार

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  4. ला-जवाब" जबर्दस्त!!

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