अधूरे ख्वाब


"सुनी जो मैंने आने की आहट गरीबखाना सजाया हमने "


डायरी के फाड़ दिए गए पन्नो में भी सांस ले रही होती है अधबनी कृतियाँ, फड़फडाते है कई शब्द और उपमाएं

विस्मृत नहीं हो पाती सारी स्मृतियाँ, "डायरी के फटे पन्नों पर" प्रतीक्षारत अधूरी कृतियाँ जिन्हें ब्लॉग के मध्यम से पूर्ण करने कि एक लघु चेष्टा ....

Wednesday, February 20, 2013

"हमसफ़र मेरे आखरी दिन चार का "

मन ही न हुआ बसंत तो क्या करूँ इस रुत बहार का
सुना था हमने के, होता है फल मीठा हर इंतज़ार का !

झोला पूरा भरा ही नहीं और जेबें हो जाती हैं खाली
सच में बड़ा बुरा हाल है आज के हर खरीददार का !

गिरे का चढाकर,चढ़े का गिराकर तय करते हैं कीमत
आज की चौकचौन्ध में यही दस्तूर है, हर बाज़ार का !

मालूम हमें, है फासिला बहुत ही ज़मीं का सितारों से
है अंदाजा भी आज के नौनिहालों की तेज रफ़्तार का !

मेरे पोसे चूज़ों के पर फड़फड़ाने लगे ,हैं तैयार उड़ने को
एक बार उड़ चले तो क्या,आके पूछेंगे हाल घर बार का !

'हम दो हमारे दो' से बाद बाकी रह जायेंगे फिर वही दो
होगा साथ मेरा, वही हमसफ़र मेरे आखरी दिन चार का !
~s-roz~

3 comments:

  1. बहुत खूबसूरत उद्गार

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    1. आभार वंदना जी !

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  2. Read your comments and that got me to visit your Facebook profile and that further led me here.
    Your poems are very good and I appreciate your work. Please keep writing such good ones.
    By the way I am a writer by profession and have more than 15 books published under my name. I am from Barmer (Raj) and my Facebook id is Rahul Neel.

    with warm wishes
    Rahul Khatri

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